दूसरी पारी के रंग आनंद, अनुभव, और ज्ञान के संग

दूसरी पारी के रंग आनंद, अनुभव, और ज्ञान के संग

(बुजुर्ग उम्र की पहचान नहीं बल्कि आनंद, अनुभव और ज्ञान का स्तंभ है)

भारत में प्रत्येक व्यक्ति के काम करने की सीमा उसकी ढलती उम्र के साथ जुडी है, ज्यादातर लोग 60 वर्ष में अपने कार्यस्थल से सेवामुक्त हो जाते है | भारत में केंद्र, राज्य, सरकारी, गैर सरकारी और निजी क्षेत्रों में और विभिन्न कार्यक्षेत्रों में सेवानिवृत की आयु 60 से 65 वर्ष के बीच निर्धारित है | और ये सिर्फ भारत में ही नहीं अगर आप आंकड़े देखे तो आप पायेंगे की विश्व के सभी देशो में सेवानिवृत की आयु 60 से 67 के बीच है | कई देशों में तो पुरुष और महिलाओ की सेवानिवृत की आयु में भी अंतर देखने को मिलता है |

सेवानिवृत सोच सिर्फ आयु से नहीं जुडी बल्कि ये समाज में ये धारणा भी है कि हर व्यक्ति को 60 साल बाद अपनी सेवाओं से मुक्ति पा ले लेना चाहिए और आराम कर प्रभु को याद करना चाहिए | कार्यस्थल छोड़ने पर सेवानिवृत लोगों को कई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ता है | बहुत से लोग अपने भविष्य के इस महत्वपूर्ण पहलू की कोई योजना भी बना कर नहीं रखते है और न इसका पूर्वाभास कर पाते हैं कि सेवानिवृत के बाद वह क्या करेंगे | 95 फीसदी लोग अपने कार्यस्थल से ही नहीं बल्कि पारिवारिक जिम्मेदारियों से भी सेवानिवृत हो जाते हैं | उनके कला और कौशल ज्ञान पर विराम लग जाता है, क्योंकि भारत सरकार एवं राज्य सरकारों ने इस दिशा में कोई ठोस नियमावली भी तैयार नहीं की है, जिससे उनके कला और कौशल ज्ञान को सेवानिवृत के बाद उपयोग किया जा सके| ऐसा भी नहीं है कि सभी सेवानिवृत लोग शारीरिक रूप से असमर्थ होते हैं बल्कि उनके अन्दर कार्य करने की क्षमता और भी अधिक हो जाती है, लेकिन सामाजिक और क़ानूनी प्रक्रिया उनके कला और कौशल ज्ञान पर विराम लगा देती है|

आज भी सामाजिक एवं कानूनी प्रक्रिया में सेवानिवृत लोगों की अपनी एक अलग पहचान हैं, समाज में जब भी किसी बड़ी सामाजिक घटनानाओं पर वाद-विवाद होता है तो वरिष्ठ पेशेवरों को बुलाया जाता है, क्योंकि उनके पास व्यवहारिक ज्ञान और अनुभव दोनों होता है, जो कि युवाओं के अन्दर कम पाया जाता है | वे हर समस्याओं के पहलुओं को आसानी से हल कर देते हैं | ठीक इसी तरह कानूनी प्रक्रिया के भी कई मामलो में वाद-विवाद को हल करने के लिए सेवानिवृत न्यायाधीशो को बुलाया जाता है और वे उस वाद-विवाद को आसानी से हल कर देते हैं और उस न्याय को सभी लोग आसानी से स्वीकार कर लेते हैं | वहां पर उनके ज्ञान को समाज स्वीकार करता है |

कहते है न – “ज्यों ज्यों उम्र बूढ़ी होती जाती है, त्यों त्यों अनुभव जवाँ होता जाता है।“ प्रश्न यह भी उठता है कि उनके कला और कौशल ज्ञान को सिर्फ 60 वर्ष तक क्यों? इसका जवाब यह भी हो सकता है की सभी व्यक्तियों को सेवा करने का अवसर मिले शायद इसलिए सेवानिवृत किया जाता है, लेकिन देश की प्रगति को आगे बढ़ाना है तो; इस बड़े वर्ग को देशहित में लगाना चाहिए | सेवानिवृत के बाद सेवार्थी का जीवन एक नाटक के रूप में बदल जाता है, क्योंकि उनको लगता है कि मुझे अब कुछ करने की जरुरत नहीं है | वे अपने कार्यस्थल एवं परिवार से भी सेवानिवृत हो जाते हैं, उनसे अक्सर सुनने में आता है कि मुझमें कार्य करने की क्षमता बहुत अधिक है, और मै कुछ करना चाहता हूँ लेकिन अब क्या करना है ये मालूम नहीं क्योंकि किसी को मेरी जरूरत ही नहीं है |

अब अपनी सेवा से मुक्त हो गए, बच्चो की पढाई-लिखाई एवं शादी से भी मुक्त हो गए, अब क्या करना है बस आराम की जिन्दगी जीना है | ये सोच उनको नकरात्मकता की और ले जाती है और वो सेवानिवृत के 2 या 3 साल बाद बीमारियों से इतने ग्रसित हो जाते हैं कि अपनी चारपाई से उठ नहीं पाते हैं या वे अपने कला और कौशल ज्ञान को चाय की दुकान या ताश के पत्ते खेल कर ख़त्म कर देते हैं, शायद इसलिए भारत पश्चिमी देशों या अन्य देशों की प्रगति से बहुत पीछे चल रहा है. क्योंकि यहाँ पर सेवा करना और न करना व्यक्ति के हाथ में नहीं बल्कि सरकारी और सामाजिक नियमावली के हाथ में होता है |

हर व्यक्ति के पास एक से अधिक कला और कौशल का ज्ञान होता है, सेवानिवृत के बाद शासकीय और व्यक्तिगत ज्ञान पर प्रतिबंध नहीं लगता है बल्कि उनके ज्ञान और अनुभवों को अन्य या सम्बंधित सेवाओं में आगे बढ़ाने का अवसर दिया जा सकता है | जिससे वे शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक रूप से संपन्न रह सकते हैं | अगर इनको उचित स्थान दिया जाये तो ये देश की प्रगति में अपना शतप्रतिशत योगदान दे सकते है और आत्मनिर्भर बने रह सकते है | “ उम्र क्या है सब अंको का खेल हैं | हम सब आज भी है सोलह के | बाक़ी सब अनुभव का मेल है ||

ये जो उम्र के दायरे में प्रतिभा को बांध दिया गया है, ये हमारी प्रगति और विकास के लिए ठीक नहीं है, इससे एक बड़ा उपयोगी संसाधन नष्ट हो रहा है| और ये सिर्फ मूल्यवान संसाधन की बर्बादी ही नहीं हो रही है बल्कि साथ में एक बड़े वर्ग का खुशी सूचकांक, (Happiness Index) स्वास्थ्य सूचकांक (Health Index) सामाजिक सूचकांक (Social Progress Index) को भी प्रभावित करता है | आज भारत में लगभग सभी क्षेत्रो में अच्छे शिक्षित, अनुभवी व कर्मठ कार्य करने वाले पेशेवर कम है, जिससे मानवीय संसधान की कमी देखी जा रही है | आज शिक्षा, स्वास्थ्य, अभियांत्रिकी, निर्माण, कारखाने, अनुसंधान, वैज्ञानिक, बैंकिंग, कॉर्पोरेट एवं अन्य क्षेत्रो में भी प्रशिक्षित मानवीय संसधान कम है या उपलब्धता नहीं है | इन कमी को देखते हुए देश की लगभग इस 8 % जनसंख्या की प्रतिभा पलायन को रोकने की योजना और मजबूत कार्यनीति बनानी चाहिए | केंद्र, राज्य, सरकारी, गैर सरकारी और सभी निजी क्षेत्रों को इन सभी वरिष्ठ अनुभवी पेशेवरो को उनकी उपलब्धता, प्रतिबद्धता और सहूलियत अनुसार सेवा में लेना चाहिए | ये सेवाएं शारीरिक या वर्चअल उपस्थिति दोनों ही तरह से संभव है, क्योंकि ये मानव संसधान न सिर्फ शिक्षित, सुयोग्य और अनुभवी है, बल्कि इनमे कार्य को सफल बनाने की इच्छाशक्ति भी देखने को मिलती है | आज आप अपने आसपास ज्यादातर सफल लोगों की आयु अगर देखे तो लगभग 60 वर्ष के आसपास होती है क्योंकि जो व्यवस्था और तंत्र का हम अनुपालन करते है उसमे सामान्यतः जिंदगी की शुरुआत के 25 वर्ष शिक्षा में और अपने आप को बनाने में, बाकि के 25 -30 वर्ष यानि 25 से 50 वर्ष की आयु अपने रोजगार क्षेत्रो को व्यवस्थित करने और परिवार की देखभाल करने में निकल जाती है और जब सब कुछ पूरा कर उसको नई ऊँचाइयो पर ले जाने का समय आता है तो व्यवस्था हमें सेवानिवृत कर देती है और उसके बाद हम शारारिक व मानसिक दोनों तरह से सेवानिवृत हो जाते है | परिस्थिति अनुसार ये लाइन शायद कुछ ऐसी होगी – “गुजरे हुए वक़्त शुक्रिया तेरा | तूने मुझे कई अनुभवों से सुसज्जित किया | और अब मै आने वाले कल तेरे लिए तैयार हूं, लेकिन अब शायद वक्त का दायरा मेरे साथ नहीं !! मेरा ऐसा मानना है की सेवानिवृत के कारण और कोई कार्य न होने के कारण सेवानिवृत व्यक्ति की आयु भी कम हो जाती है और उसकी मृत्यु भी जल्दी हो जाती है|

आनंद के साथ दूसरी पारी की सही शुरुआत जंहा अनुभव और ज्ञान का मिश्रण बनेगा वहीं जीवन को एक नया स्थान और सम्मान मिलेगा | उपरोक्त सभी बातों को ध्यान में रख कर सेवानिवृत्त कार्य बल को उचित उपयोग में लाना बहुत आवश्यक है | इस दिशा में www.neversayretired.in जैसी सेवाएं मील का पथर साबित होंगी | श्री विजय मारु जी और उनकी टीम के इस सराहनीय प्रयास की मै कोटि-कोटि प्रसंशा करता हूँ और सफलता के लिए शुभकामनां देता हूँ, साथ ही उनके इस प्रयास को और सहयोग देने और उसे आगे ले जाने में अपने संगठन भारतीय सामाजिक दायित्व संघ, (www.isrn.in) के माध्यम से हर संभव सहयोग का आश्वाशन देता हूँ |

Author Bio

Santosh Gupta
Santosh Gupta

संतोष गुप्ता, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, भारतीय सामाजिक दायित्व संघ

Santosh Gupta is the CEO of Indian Social Responsibility Network (ISRN) as well as one of its founding member.

With an enriching experience of more than 22 years on social development issues working with the government, multilateral organizations, and NGOs. He has worked in Ministry of Home Affairs, Government of India, National Institute of Disaster Management (NIDM), UNDP, UNICEF, Delhi Disaster Management Authority, Govt. of NCT of Delhi, CARE India, U.P. Land Development Corporation among others. Where he has handled major national & international projects and programs. In the last few years, he has built expertise on CSR, and leading a prominent CSR network in India.

He is also member of Expert Appraisal Committee (Non-Coal Mining), and member of National Afforestation and Eco-Development Board (NAEB), Ministry of Environment, Forest and Climate Change, Government of India and member, State level Vigilance & Monitoring Committee for the State of Uttar Pradesh, Ministry of Rural Development, Government of India.

His experience is with diverse stakeholders like government, public representatives, vulnerable communities, NGOs, opinion leaders and community volunteers has come up as an asset for establishment & growth of ISRN.

2 thoughts on “दूसरी पारी के रंग आनंद, अनुभव, और ज्ञान के संग”

  1. हेमेंद्र चतुर्वेदी

    “उम्र क्या है सब अंकों का खेल है”
    बेहतरीन लेख। नमन 🙏

  2. Ram Balak Singh

    Thoughts of writer is very useful for our country.we should tap and use potential of retired persons for the country.But how?But how?

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