आज जब भी हम मित्रों, रिश्तेदारों या परिचितों के बीच बैठते हैं, एक बात लगभग निश्चित रूप से चर्चा में आ जाती है—”आजकल बच्चे हमारी बात मानते ही नहीं।” कई लोग यह भी कहते हैं कि बच्चों पर दोस्तों या शिक्षकों की बात का असर अधिक होता है, जबकि माता-पिता और परिवार के बड़े पीछे छूट जाते हैं।
यह केवल घर-परिवार की बात नहीं है। समाज में भी जब हम अनुशासनहीनता, असंवेदनशीलता, स्वार्थ या नैतिक मूल्यों में गिरावट जैसी बातें देखते हैं, तो अक्सर कहते हैं—”अब पहले जैसी बात नहीं रही।” ऐसे में मन में एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि क्या इस स्थिति के लिए हम बुजुर्ग और अभिभावक भी कुछ हद तक जिम्मेदार हैं? आखिर जो भी युवक या युवती गलत रास्ते पर जाते हैं, वे किसी न किसी परिवार के ही सदस्य होते हैं। क्या उनके संस्कारों की नींव रखने में कहीं कोई कमी रह गई?
मुझे लगता है कि इस प्रश्न पर ईमानदारी से विचार करना आवश्यक है।
बच्चे केवल हमारी बातें नहीं सुनते, वे हमें देखते भी हैं। वास्तव में वे भाषणों से कम और व्यवहार से अधिक सीखते हैं। घर उनका पहला विद्यालय होता है और माता-पिता उनके पहले शिक्षक। यदि हम स्वयं अनुशासन, ईमानदारी, धैर्य, संवेदनशीलता और बड़ों के सम्मान का पालन नहीं करेंगे, तो बच्चों से इन गुणों की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?
संस्कार देने में हमारी पहली चूक अक्सर आदर्श प्रस्तुत करने में होती है। यदि हम बच्चों के सामने झूठ बोलते हैं, छोटी-छोटी बातों में नियमों की अनदेखी करते हैं या दूसरों के प्रति असम्मानजनक व्यवहार करते हैं, तो बच्चे यही सीखते हैं। वे हमारे शब्दों से अधिक हमारे कर्मों पर विश्वास करते हैं।
दूसरी बड़ी चुनौती समय की है। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता अपने बच्चों के लिए पर्याप्त समय नहीं निकाल पाते। बच्चों की हर भौतिक आवश्यकता पूरी करने का प्रयास तो होता है, लेकिन उनके मन की बात सुनने, उनके प्रश्नों का उत्तर देने और उनके साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताने के अवसर कम होते जा रहे हैं। संवाद की कमी कई बार संस्कारों की कमी में बदल जाती है।
तीसरी बात है अपेक्षाओं का बढ़ता बोझ। हम अपने बच्चों को श्रेष्ठ शिक्षा, बेहतर करियर और आर्थिक सफलता दिलाने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। समस्या तब शुरू होती है जब सफलता की दौड़ में चरित्र निर्माण पीछे छूट जाता है। अच्छे अंक और अच्छी नौकरी जीवन को सफल बना सकते हैं, लेकिन अच्छे संस्कार ही जीवन को सार्थक बनाते हैं। मुझे यहां संघ के एक गीत की प्रथम लाइन याद आ रही हैं – “निर्माणों के पावन युग में, हम चरित्र निर्माण न भूलें”।
चौथा कारण आधुनिकता और दिखावे की संस्कृति भी है। सोशल मीडिया ने जीवन की तुलना और प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। बच्चों के सामने लगातार ऐसे उदाहरण आते हैं जहां सफलता, प्रसिद्धि और धन को सबसे बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यदि घर में भी इन्हीं बातों को अधिक महत्व दिया जाएगा, तो स्वाभाविक रूप से सेवा, त्याग, सहानुभूति और विनम्रता जैसे मूल्य कमजोर पड़ने लगेंगे।
लेकिन पूरी जिम्मेदारी केवल माता-पिता या बुजुर्गों पर डालना भी उचित नहीं होगा। आज बच्चों पर मित्रों, स्कूल, मोबाइल फोन, इंटरनेट, मनोरंजन माध्यमों और पूरे सामाजिक वातावरण का गहरा प्रभाव पड़ता है। डिजिटल दुनिया चौबीसों घंटे उनके साथ रहती है। ऐसे में संस्कारों का निर्माण केवल परिवार नहीं, बल्कि पूरे परिवेश का संयुक्त परिणाम बन जाता है।
फिर समाधान क्या है?
समाधान दोष ढूंढने में नहीं, बल्कि उदाहरण बनने में है। बच्चों को उपदेश देने से अधिक प्रभाव उनके साथ समय बिताने, उनसे संवाद करने और अपने जीवन में मूल्यों को जीने से पड़ता है। यदि परिवार में सम्मान, संवेदनशीलता, ईमानदारी और जिम्मेदारी का वातावरण होगा, तो बच्चे उसे स्वाभाविक रूप से आत्मसात करेंगे।
संस्कार कोई एक दिन में दिया जाने वाला पाठ नहीं है। यह वर्षों तक चलने वाली प्रक्रिया है, जो हमारे व्यवहार, हमारी प्राथमिकताओं और हमारे जीवन जीने के तरीके से बनती है।
शायद समय आ गया है कि हम नई पीढ़ी को दोष देने से पहले स्वयं से यह प्रश्न पूछें—क्या हम वह उदाहरण प्रस्तुत कर पा रहे हैं, जिसे देखकर बच्चे सीखना चाहें? यदि हम इस प्रश्न का ईमानदारी से उत्तर खोज लें, तो संस्कारों की यह चिंता काफी हद तक दूर हो सकती है।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।





