अगर आप उन किस्मत वालों में से एक हैं, जो सत्तर वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, तो थोड़ा दिमाग पर जोर देते हुए याद करने का प्रयास कीजिए कि जब आप स्कूल और कॉलेज में पढ़ते थे, तब आपके घर का वातावरण कैसा रहता था। अब उसी वातावरण की तुलना आज के घर से कीजिए, जहां आपके पोते-पोतियां पढ़ाई कर रहे हैं।
हमारे समय में स्कूल से घर लौटने के बाद पढ़ाई जरूर होती थी, लेकिन उसके बाद घर से बाहर निकलकर दोस्तों के साथ खेलना भी हमारी दिनचर्या का एक जरूरी हिस्सा था। गली-मोहल्ले के बच्चे साथ होते थे। खेल के नियम भी हम खुद बनाते थे और झगड़े भी खुद ही सुलझा लेते थे। हारना, जीतना, अपनी बारी का इंतजार करना, दूसरे की बात मानना और कभी-कभी अपनी गलती स्वीकार करना — ये सब जीवन के ऐसे पाठ थे, जो हमें किसी किताब में नहीं पढ़ाए गए।
आज के बच्चों के पास शायद खेलने के लिए समय ही नहीं है। स्कूल से लौटे नहीं कि असाइनमेंट, प्रोजेक्ट और पढ़ाई का दबाव शुरू हो जाता है। इसके बाद म्यूजिक क्लास, डांस, कराटे, स्विमिंग, अबेकस और न जाने कितनी दूसरी गतिविधियां। माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा हर क्षेत्र में आगे रहे। वे अपने बच्चे को भविष्य की प्रतियोगिता के लिए तैयार करना चाहते हैं।
लेकिन कभी-कभी यह विचार जरूर आता है कि आखिर हम अपने बच्चों को बनाना क्या चाहते हैं — एक सफल इंसान या एक खुशहाल इंसान?
हमारे समय का एक और बड़ा अंतर परिवार की संरचना का था। हममें से बहुतों के घरों में भाई-बहनों के अलावा चाचा-ताऊ के बच्चे भी आसपास रहते थे। संयुक्त परिवारों में बच्चों की संख्या ज्यादा होती थी। घर में हमेशा किसी न किसी हमउम्र के साथ खेलने और बातचीत करने का अवसर रहता था। आज एकल परिवार सामान्य बात है और कई परिवारों में एक ही बच्चा है।
एक और बात पर ध्यान दीजिए। जब हम पढ़ते थे, तो कितने बच्चों के पास अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग ट्यूशन शिक्षक होते थे? हमारे माता-पिता में से कितने लोग हर विषय के लिए विशेष कोचिंग का खर्च उठा सकते थे? अधिकांश बच्चे स्कूल में जो पढ़ाया जाता था, उसी पर निर्भर रहते थे। जरूरत पड़ने पर किसी बड़े भाई, बहन, पड़ोसी या घर के किसी सदस्य से मदद ले लेते थे।
आज शिक्षा के अवसर निश्चित रूप से बढ़े हैं। तकनीक ने ज्ञान को हमारे घर तक पहुंचा दिया है। लेकिन इसी तकनीक ने घर के वातावरण को भी बदल दिया है।
मोबाइल फोन, लैपटॉप, टैबलेट और इंटरनेट आज लगभग हर घर का हिस्सा हैं। बच्चे इन उपकरणों में व्यस्त हैं तो माता-पिता भी उनसे अछूते नहीं हैं। कभी काम के लिए, कभी सोशल मीडिया के लिए और कभी मनोरंजन के लिए — परिवार के सदस्यों का ध्यान अक्सर एक ही कमरे में रहते हुए भी अलग-अलग स्क्रीन पर रहता है।
फिर वह समय कब मिलता है जब दादा-दादी, माता-पिता और बच्चे बैठकर आपस में बात करें? कब बच्चे घर के बड़ों से अपने सवाल पूछें? कब उन्हें बातों-बातों में जीवन के छोटे-छोटे अनुभव और जीवन कौशल सीखने का अवसर मिले?
शायद यही एक कारण है कि आज बच्चों में चिड़चिड़ापन और अधीरता कुछ अधिक दिखाई देती है। इसमें बच्चों का दोष कितना है, यह सोचने की जरूरत है। जब बच्चा कोई फरमाइश करता है और माता-पिता तुरंत उसे पूरा कर देते हैं, तो धीरे-धीरे बच्चे को यह आदत हो सकती है कि हर इच्छा तुरंत पूरी होनी चाहिए।
माता-पिता भी कई बार असमंजस में रहते हैं। बच्चों से कैसे बात करें, कितना समझाएं, कहां अनुशासन रखें और कहां उन्हें स्वतंत्र छोड़ें — इन सवालों के आसान जवाब नहीं हैं। व्यस्त जीवन और कम होते पारिवारिक संवाद ने स्थिति को और कठिन बना दिया है।
मेरे विचार से समस्या का मूल केवल मोबाइल या ट्यूशन नहीं है। मूल समस्या परिवार के वातावरण में आया बदलाव है।
लेकिन अच्छी बात यह है कि अभी बहुत देर नहीं हुई है। हमें बच्चों को उनके समय से निकालकर अपने समय में वापस नहीं ले जाना है। हमें तकनीक को भी छोड़ना नहीं है और आधुनिक शिक्षा को भी नहीं। जरूरत केवल इतनी है कि आधुनिक सुविधाओं और पारिवारिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाया जाए।
दादा-दादी और नाना-नानी के पास बच्चों को देने के लिए केवल समय ही नहीं, बल्कि अनुभव भी है। वे बच्चों के साथ खेल सकते हैं, उनसे बातें कर सकते हैं, उन्हें अपने बचपन की कहानियां सुना सकते हैं और बिना किसी किताब के जीवन के कई महत्वपूर्ण पाठ सिखा सकते हैं। सबसे बड़ी बात, वे बच्चों को यह एहसास करा सकते हैं कि उनके पास सुनने वाला कोई अपना है।
परिवार को फिर से संवाद का स्थान बनाना होगा। दिन में कुछ समय ऐसा हो जब मोबाइल दूर रखे जाएं और परिवार के लोग आमने-सामने बैठें। सप्ताह में कुछ समय बच्चों के साथ खेला जाए। उनसे उनके स्कूल, दोस्तों और उनकी छोटी-बड़ी चिंताओं के बारे में पूछा जाए।
अगर आज हम इस ओर सचेत हो जाएं, तो अगले 20–25 वर्षों में हम अपने घरों का वातावरण काफी हद तक सकारात्मक दिशा में बदल सकते हैं।
बच्चों का भविष्य केवल अच्छी पढ़ाई, अच्छे अंक और अच्छे करियर से नहीं बनेगा। उन्हें एक ऐसा घर भी चाहिए जहां समय हो, संवाद हो, अनुशासन हो, अपनापन हो और सबसे बढ़कर — परिवार हो। शायद यही वह बदलाव है जिसकी शुरुआत हमें आज से ही करनी चाहिए।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




