एक समय था जब खुश रहने के लिए किसी बड़ी योजना की आवश्यकता नहीं होती थी। खुशियां अपने आप, चुपचाप और सहज ही जीवन में आ जाती थीं।
गर्मी की छुट्टियों का नाम सुनते ही मन उत्साह से भर जाता था। स्कूल बंद होते और सालाना पारिवारिक यात्रा की तैयारी शुरू हो जाती। हमारे लिए छुट्टियों का मतलब किसी हिल स्टेशन या समुद्र तट पर जाना नहीं था। कभी ननिहाल, कभी बुआ का घर, कभी कोई तीर्थस्थान, तो कभी अपना पुश्तैनी कस्बा। मंजिल से कहीं अधिक आनंद यात्रा में होता था।
आज छुट्टियों की योजना महीनों पहले बनने लगती है। कौन-सी जगह जाएं, किस होटल में ठहरें, क्या-क्या देखें — सब पहले तय होता है। अब तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी यात्रा सलाहकार बन चुका है।
इसमें कुछ भी गलत नहीं है। तकनीक ने यात्राएं पहले से कहीं अधिक आसान बना दी हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमने यह मान लिया है कि खुशी केवल मंजिल पर पहंचने में है।
उस समय तो यात्रा ही छुट्टी होती थी।
रेल यात्रा हर सफर की जान होती थी। टिकट पहले से बुक कराए जाते थे। कई बार सर्कुलर रेलवे टिकट भी बनवाए जाते थे, जिनसे कम खर्च में कई स्थानों की यात्रा हो जाती थी, बस एक ही स्टेशन दोबारा नहीं आना चाहिए।
सन् 1975 में दो अन्य दंपतियों के साथ हमने पूरे एक महीने की यात्रा की। पूर्वी तट से कन्याकुमारी तक, फिर पश्चिमी तट से होते हुए बंबई (अब मुंबई) और वहां से अपने शहर रांची लौटे। उस पूरे महीने के सर्कुलर टिकट का किराया मात्र 165 रुपये प्रति व्यक्ति था।
याद है डिब्बे में अनजान यात्रियों के साथ अंताक्षरी खेलना, टिफिन खोलकर सबके साथ घर का खाना बांटना। तब मोबाइल फोन नहीं थे। लोग खिड़की से बाहर बदलते दृश्य देखते थे, बातें करते थे, हंसते थे और हर पल को जीते थे।
जीवन की रफ्तार भी कुछ ऐसी ही थी। हमारे पास चीजें कम थीं, लेकिन एक-दूसरे के लिए समय कहीं अधिक था।
शादियां भी अलग ही रंग लिए होती थीं। लोग केवल समारोह में शामिल होने नहीं आते थे, बल्कि साथ समय बिताने आते थे। सब लोग एक ही जगह ठहरते थे। सुबह से रात तक चाय के साथ बातचीत, बचपन की यादें, रिश्तेदारों के किस्से और पिछली मुलाकातों की बातें चलती रहती थीं।
आज शादियां शानदार होटलों और रिसॉर्ट्स में होती हैं। सारी सुविधाएं होती हैं, लेकिन अक्सर लोग अपने कमरों में चले जाते हैं और केवल भोजन या रस्मों के समय ही मिलते हैं। सब कुछ व्यवस्थित है, पर वे सहज बातचीत कहीं कम हो गई है जो रिश्तों को और गहरा बना देती थी।
हमारी संध्या बेला भी अलग होती थीं। बच्चे अंधेरा होने तक खेलते रहते थे और बड़े लोग घर के बाहर या छत पर बैठकर देश-दुनिया से लेकर मोहल्ले तक हर विषय पर बातें करते थे। समय धीरे-धीरे बीतता था, क्योंकि रिश्ते गहरे होते थे।
शायद यही कारण है कि वे पल आज भी इतने यादगार लगते हैं।
वरिष्ठ नागरिक होने के नाते हम उन दिनों को स्नेह से याद करते हैं। लेकिन यह लेख अतीत में लौटने का आग्रह नहीं करता। यह केवल याद दिलाता है कि उन सरल खुशियों में से बहुत-सी आज भी हमारे आसपास मौजूद हैं।
भले ही अब हम महीने भर रेल यात्रा न कर पाएं, लेकिन आराम से सफर करना, घर का खाना साथ ले जाना, किसी सहयात्री से बातचीत शुरू करना, मित्रों के साथ बिना मोबाइल देखे समय बिताना या बिना तस्वीर खींचे डूबते सूरज का आनंद लेना — यह सब आज भी संभव है।
तकनीक एक उत्कृष्ट सेवक है, लेकिन खराब मालिक। इसका उपयोग जीवन को बेहतर बनाने के लिए करें, जीवन का स्थान लेने के लिए नहीं।
नेवर से रिटायर्ड अभियान का संदेश अतीत में लौटना नहीं है। उसका उद्देश्य उन मूल्यों को आगे बढ़ाना है जिन्होंने जीवन को अर्थ दिया — मानवीय संबंध, सादगी, कृतज्ञता और अपनापन। ये किसी एक पीढ़ी की धरोहर नहीं, हर पीढ़ी की पूंजी हैं।
अच्छी बात यह है कि सादगी कभी पुरानी नहीं होती। उसे किसी भी उम्र में फिर से अपनाया जा सकता है। और तब महसूस होता है कि जीवन की सबसे बड़ी खुशियां तो हमेशा से हमारे आसपास ही थीं।
हम इन यादों को इसलिए नहीं संजोते कि अतीत में जी सकें, बल्कि इसलिए कि बीते कल की सादगी को आज के जीवन में ला सकें। समय को पीछे नहीं ले जाया जा सकता, लेकिन उसकी रफ्तार जरूर धीमी की जा सकती है। शायद यही हमारी दूसरी पारी का सबसे बड़ा उपहार है।
खुशियां हमेशा बड़ी उपलब्धियों में नहीं, छोटे-छोटे पलों में छिपी होती हैं। आइए, उन्हें फिर से पहचानें।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।





