हम संतोष करना सीखें

हम संतोष करना सीखें Be Happy With What You Have

मुझे पिछले दिनों एक बहुत ही सुंदर और शिक्षाप्रद सुविचार पढ़ने को मिला। उसमें लिखा था— “जो कम में खुश रहना सीख लेता है, उसकी खुशी कभी कम नहीं होती।” यह एक छोटी-सी पंक्ति है, लेकिन यदि हम इसके अर्थ को समझ लें तो जीवन की बहुत-सी परेशानियों का समाधान इसमें छिपा हुआ है।

आजकल अधिकांश व्हाट्सएप समूहों में, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों के समूहों में, प्रतिदिन अनेक प्रेरणादायक सुविचार साझा किए जाते हैं। नेवर से रिटायर्ड की ओर से भी समय-समय पर ऐसे संदेश भेजे जाते हैं और उन्हें वेबसाइट पर भी प्रकाशित किया जाता है। इन्हीं में यह सुविचार भी पढ़ने को मिला और उसने मन को गहराई से छू लिया।

जरा सोचिए, हमारे दुखों का एक बड़ा कारण क्या है? अक्सर हम अपनी परिस्थितियों से उतने दुखी नहीं होते, जितने दूसरों की परिस्थितियों को देखकर हो जाते हैं। हमारे पास जो है, वह पर्याप्त हो सकता है, लेकिन जैसे ही हम किसी और के पास अधिक देखते हैं, मन में कमी का भाव आ जाता है। यही तुलना धीरे-धीरे असंतोष को जन्म देती है।

आज का समाज तुलना और दिखावे की संस्कृति से बहुत प्रभावित है। किसी ने नई कार खरीदी तो हमें भी बड़ी कार की इच्छा होने लगती है। किसी ने बड़ा घर बना लिया तो अपना घर छोटा लगने लगता है। किसी के बच्चे विदेश में हैं तो हमें लगता है कि हमारे बच्चों को भी वहीं होना चाहिए। यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होता, क्योंकि हमेशा कोई न कोई हमसे अधिक संपन्न, अधिक सफल या अधिक प्रसिद्ध दिखाई देगा।

इसका अर्थ यह नहीं कि महत्वाकांक्षा छोड़ दी जाए। प्रगति करने की इच्छा रखना स्वाभाविक और आवश्यक है। जीवन में आगे बढ़ने का प्रयास हमें सक्रिय रखता है। लेकिन महत्वाकांक्षा और लालच के बीच एक बहुत बारीक रेखा होती है। महत्वाकांक्षा हमें मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है, जबकि लालच हमें बेचैन और असंतुष्ट बना देता है।

यदि हमें बड़ी गाड़ी चाहिए, बेहतर घर चाहिए या आर्थिक स्थिति मजबूत करनी है, तो उसके लिए मेहनत कीजिए, नए अवसर तलाशिए और अपनी क्षमता के अनुसार आगे बढ़िए। लेकिन साथ ही यह भी याद रखिए कि जो कुछ हमारे पास आज है, उसके लिए भी कृतज्ञ होना चाहिए। केवल भविष्य की उपलब्धियों पर ध्यान देने से वर्तमान का आनंद खो जाता है।

वरिष्ठ नागरिकों के लिए तो संतोष का महत्व और भी अधिक है। जीवन के इस पड़ाव तक पहुंचते-पहुंचते हम बहुत कुछ देख और पा चुके होते हैं। अब यदि हम हर समय यह सोचते रहें कि काश यह भी मिल जाता या वह भी हो जाता, तो मन कभी शांत नहीं रहेगा। इसके विपरीत यदि हम अपने परिवार, स्वास्थ्य, अनुभव और उपलब्धियों को देखें, तो महसूस होगा कि ईश्वर ने हमें बहुत कुछ दिया है।

संतोष का अर्थ ठहर जाना नहीं है। इसका अर्थ है जो प्राप्त है उसका सम्मान करना और जो चाहिए उसके लिए सही दिशा में प्रयास करना। यह जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करता है। संतोषी व्यक्ति छोटी-छोटी खुशियों का आनंद लेना जानता है। वह सुबह की सैर, परिवार के साथ बिताए समय, मित्रों से बातचीत और अच्छे स्वास्थ्य को भी जीवन की बड़ी उपलब्धियां मानता है।

हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि गलत रास्तों से प्राप्त की गई सफलता कभी सच्चा सुख नहीं देती। यदि कोई व्यक्ति छल, कपट या बेईमानी से धन और साधन जुटा भी ले, तो उसके मन की शांति खो जाती है। अंततः कर्मों का फल अवश्य मिलता है। इसलिए जो भी प्राप्त करना है, ईमानदारी और परिश्रम से प्राप्त करें।

वास्तव में संतोष कोई बाहरी वस्तु नहीं, बल्कि मन की अवस्था है। जिसके मन में संतोष है, वह सीमित साधनों में भी प्रसन्न रह सकता है। और जिसके मन में असंतोष है, उसके लिए संसार की सारी संपत्ति भी कम पड़ सकती है।

आइए, हम अपने जीवन में संतोष का भाव विकसित करें। जो हमारे पास है, उसके लिए आभार व्यक्त करें। जो नहीं है, उसके लिए मेहनत करें, लेकिन उसकी कमी को दुख का कारण न बनने दें। शायद तभी हम सच्चे अर्थों में सुखी, शांत और संतुष्ट जीवन जी पाएंगे।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *