मृत्यु का भय नहीं, जीवन का सम्मान करें

मृत्यु का भय नहीं, जीवन का सम्मान करें Living Positively in the Evening of Life

सुबह-सुबह मोबाइल पर एक संदेश आता है — “आपके सहपाठी का निधन हो गया।”

कुछ क्षणों के लिए मन जैसे शून्य हो जाता है। यह वही मित्र था जिसके साथ मैंने इंजीनियरिंग छात्रावास में पांच वर्ष बिताए थे। हंसी-मजाक, संघर्ष, सपने, परीक्षाएं — जीवन का एक बड़ा हिस्सा उसके साथ जुड़ा था।

ऐसा संदेश आज पहली बार नहीं आया। दो महीने पहले भी एक पुराने साथी के जाने की खबर मिली थी। और सच कहूं तो अब उम्र के इस पड़ाव पर यह समझ आने लगा है कि आगे भी ऐसे समाचार आते रहेंगे।

आज व्हाट्सएप्प का युग है। सूचना पल भर में मिल जाती है। एक समय था जब किसी प्रियजन के निधन का समाचार कई दिनों बाद मिलता था। कभी टेलीग्राम आता था, कभी “लाइटनिंग कॉल” होती थी, और कई बार एक साधारण पोस्टकार्ड ही यह दुखद सूचना लेकर आता था। आज की पीढ़ी शायद टेलीग्राम और लाइटनिंग कॉल के नाम से भी परिचित न हो। समय बदल गया है, साधन बदल गए हैं, लेकिन मृत्यु का सत्य नहीं बदला।

हममें से जो लोग 75 वर्ष की आयु पार कर चुके हैं, वे वास्तव में एक प्रकार का “बोनस जीवन” जी रहे हैं। चिकित्सा सुविधाओं और बेहतर जीवनशैली के कारण औसत आयु बढ़ी है, इसलिए आज अधिक लोग इस उम्र तक पहुंच रहे हैं। लेकिन इसके साथ एक नया डर भी जुड़ जाता है।

हल्का-सा सीने में दर्द हो तो मन घबराने लगता है — कहीं यह हार्ट अटैक तो नहीं?

थोड़ा जल्दी थक जाएं तो लगता है कि शरीर अब जवाब देने लगा है। रात को नींद खुल जाए तो मन में विचारों का तूफान चल पड़ता है — “हमारे बाद क्या होगा?”

यही चिंता धीरे-धीरे हमारी मानसिक शांति और स्वास्थ्य दोनों को प्रभावित करने लगती है।

लेकिन क्या जीवन के इस चरण को भय और चिंता में बिताना ही उचित है? मेरा मानना है कि नहीं। यह समय है जीवन को और अधिक समझदारी, संतुलन और सकारात्मकता से जीने का।

सबसे पहली आवश्यकता है — अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना। योग, प्राणायाम, हल्का व्यायाम, नियमित पैदल चलना — जो भी संभव हो, उसे निरंतर करते रहना चाहिए। उम्र बढ़ने का अर्थ यह नहीं कि हम निष्क्रिय हो जाएं। शरीर जितना सक्रिय रहेगा, मन भी उतना ही स्थिर और आशावादी रहेगा।

दूसरी महत्वपूर्ण बात है — परिवार से जुड़े रहना। जीवन भर चाहे आपने कितना ही धन, प्रतिष्ठा या संपत्ति अर्जित की हो, लेकिन अंतिम वर्षों में मनुष्य को सबसे अधिक आवश्यकता साथ और अपनत्व की होती है। और यह सच्चा साथ केवल परिवार ही दे सकता है।

यह भी जीवन का कठोर सत्य है कि पति-पत्नी में से किसी एक को पहले जाना ही होगा। भगवान ने शायद ऐसा नियम बनाया है कि दोनों एक साथ विदा नहीं होते। इसलिए भावनात्मक रूप से भी अपने आपको मजबूत बनाना आवश्यक है।

एक और विषय जिस पर समय रहते विचार करना चाहिए, वह है अपनी संपत्ति और उत्तरदायित्वों का स्पष्ट निर्णय। वसीयत बनाना, आवश्यक दस्तावेज व्यवस्थित रखना, जीवन में ही कुछ संपत्ति बच्चों या जरूरतमंदों को देना — ये सब कदम मन को बहुत शांति देते हैं।

लेकिन यहां एक संतुलन भी जरूरी है। ऐसा न हो कि भावुकता में आकर हम सब कुछ दूसरों को सौंप दें और अपने लिए कुछ भी न बचाएं। हमें नहीं पता कि भगवान ने हमें कितने वर्ष और दिए हैं और उन वर्षों में कितनी आर्थिक आवश्यकता पड़ेगी। जिन लोगों पर हम आज भरोसा कर रहे हैं, परिस्थितियों के कारण कल वे स्वयं असहाय हो सकते हैं।

इसलिए समझदारी इसी में है कि प्रेम भी रहे, सुरक्षा भी रहे और आत्मसम्मान भी बना रहे।

अंततः, मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि प्रकृति का शाश्वत नियम है। जो आया है, उसे एक दिन जाना ही है। लेकिन हमारे हाथ में यह अवश्य है कि हम अपने शेष जीवन को भय में बिताएं या फिर मुस्कुराते हुए, सक्रिय रहते हुए और दूसरों के लिए प्रेरणा बनते हुए जिएं।

यदि हम हर सुबह यह सोचकर उठें कि “आज का दिन भी भगवान का एक उपहार है,” तो शायद जीवन का यह “बोनस समय” वास्तव में सबसे सुंदर समय बन सकता है।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

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