बुजुर्गों में सामाजिक अलगाव से जन्म लेती समस्याएं

बुजुर्गों में सामाजिक अलगाव से जन्म लेती समस्याएं

आज हमारे समाज में एक गहन चिंता का विषय बन गया है बुजुर्गों में सामाजिक अलगाव। इसका नुकसान भावनात्मक और शारीरिक, दोनों तरह के सम्बन्धों से होता है। जब वरिष्ठ नागरिक अपने परिवार, समुदाय और यहां तक कि साथियों से भी अलग-थलग हो जाते हैं, तो इसके परिणाम अकेलेपन से कहीं ज़्यादा हो सकते हैं। इस स्थिति में मानसिक स्वास्थ समस्या, पुरानी बीमारी और जीवन की गुणवत्ता में कमी, उभर कर सामने आने लगती हैं। हम-उम्र के साथियों से मिलना भी दूभर हो जाता है। उनमें से कुछ तो भगवान को प्यारे हो गये होते है। स्थिति विशेष रूप से तब अधिक विकट हो जाती है जब बुजुर्ग व्यक्ति अपने जीवनसाथी को खो देते हैं या जब बच्चे दूर रहने लग जाते हैं।

मानसिक स्वास्थ पर सामाजिक अलगाव का प्रभाव

अवसाद, चिंता और संज्ञानात्मक गिरावट, जैसे कि याददास्त पर असर, तर्क करने की क्षमता या कल्पना करना जैसी मानसिक स्वास्थ समस्याएं अक्सर सामाजिक अलगाव से बढ़ जाती हैं। दोस्तों या परिवार के साथ नियमित बातचीत के बिना, बुजुर्गों में उदासी, चिंता या निराशा की भावनाएँ विकसित हो सकती हैं। उनका सामाजिक नेटवर्क समय बीतने के साथ सिकुड़ सकता है, जिससे उन्हें अनुभव साझा करने या भावनात्मक समर्थन प्राप्त करने के कम अवसर मिलते हैं। अकेलापन अक्सर डिमेंशिया और अल्जाइमर रोग जैसी स्थितियों की शुरुआत से जुड़ा होता है।

सामाजिक अलगाव का शारीरिक स्वास्थ पर प्रभाव

अलगाव के जोखिम सिर्फ़ मानसिक स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं हैं। जब वरिष्ठ नागरिक सामाजिक रूप से अलग-थलग हो जाते हैं, तो उनका शारीरिक स्वास्थ भी बिगड़ सकता है। शोध से पता चलता है कि सामाजिक अलगाव किसी व्यक्ति के स्वास्थ के लिए धूम्रपान या मोटापे जितना ही हानिकारक है।

परिवार की भूमिका: जब बच्चे दूर हों

बुढ़ापे के सबसे दर्दनाक पहलुओं में से एक यह एहसास है कि बच्चे अब शारीरिक रूप से सहायता प्रदान करने के लिए मौजूद नहीं हो सकते हैं। कई बुज़ुर्ग व्यक्तियों के लिए, भौगोलिक दूरी या व्यस्त जीवन के कारण बच्चों की अनुपस्थिति अकेलेपन की गहरी भावना पैदा कर सकती है। हालांकि आज टेक्नोलॉजी परिवारों को जुड़े रहने की अनुमति देती है, लेकिन बुजुर्ग व्यक्तियों और उनके बच्चों के बीच भावनात्मक और शारीरिक दूरी ऐसी स्थिति में भी भारी पड़ सकती है, वो गर्मजोशी नहीं हो सकती जो आमने-सामने बातचीत से मिलती है।

जीवनसाथी को खोने का दुख

जीवनसाथी की मृत्यु एक बुजुर्ग व्यक्ति के लिए सबसे बड़ी दुखदायी स्थिति होती है। जीवनसाथी सिर्फ़ साथी ही नहीं होते, बल्कि अक्सर भावनात्मक समर्थन, रोजाना साथ और देखभाल का प्राथमिक स्रोत होते हैं। जब वे गुजर जाते हैं, तो जीवित बचे जीवनसाथी को पूरी तरह से अलग-थलग महसूस होने लगता है, भले ही उनके आस-पास बच्चे या दोस्त हों। जीवनसाथी की निरंतर मौजूदगी के बिना, दैनिक दिनचर्या खाली लगने लगती है और भावनात्मक शून्यता अवसाद का कारण बन सकती है।

चक्र को तोड़ना: क्या किया जा सकता है?

सामाजिक अलगाव एक बढ़ती हुई चिंता है, पर इससे निपटने के तरीके हैं और हमारे बुजुर्ग प्रियजनों को अधिक जुड़ाव महसूस कराने में सहयोग कर सकते हैं। समाधान हमें ही ढूंढना हैं।

ग्रुप्स बना कर गतिविधियां करना बहुत आवश्यक हैं। दूसरी और प्रौद्योगिकी ने दूर रह रहे व्यक्तियों के साथ भी जुड़ना आसान बना दिया है। अब दूरी कोई बाधा नहीं हैं। वीडियो कॉल, सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म और ऑनलाइन समुदाय इस अंतर को पाट सकते हैं, बुजुर्ग व्यक्तियों को परिवार और दोस्तों के साथ जुड़े रहने का एक तरीका प्रदान करते हैं। हालाँकि, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वयस्कों के पास इन तकनीकों का उपयोग करने के लिए कौशल और सहायता हो। परिवार के सदस्य, यहाँ तक कि दूर रहने वाले संबधी भी, यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा सकते हैं कि उनके बुजुर्ग रिश्तेदार अलग-थलग न रहें। नियमित फोन कॉल, पत्र या देखभाल पैकेज भेजना और मुलाकातों की योजना बनाना महत्वपूर्ण है। यदि मिलना संभव नहीं है, तो वर्चुअल मीटिंग के लिए शेड्यूल बनाना भावनात्मक संबंधों को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है।

बुजुर्गों का सामाजिक अलगाव एक ऐसा विषय है जिस पर हमें ध्यान देने और सहानुभूति दिखाने की आवश्यकता है। यह जरूरी है कि हम ऐसे सहायता तंत्र बनाएं जो हमारे बुज़ुर्गों के मानसिक, भावनात्मक और शारीरिक स्वास्थ की रक्षा करें। इस प्रक्रियां में सरकारी तंत्र को भी आगे आना होगा। स्वयंसेवी संस्थाएं बहुत हैं जो स्कूलों, अस्पतालो, मंदिरो वगैरह चलाने में लगे हैं। आज की आवश्यकताओं को देखते हुए यह भी सुनिश्चित करना होगा की हम ऐसी स्वयंसेवी सस्थाएं का भी अधिकाधिक निर्माण करे जो कि बुजुर्गो की सामुदायिक जुड़ाव के लिए ज़्यादा संसाधन उपलब्ध कराने के लिए काम करे।

हमें ही देखना हैं कि हमारे बुजुर्ग प्रियजन न सिर्फ लंबे समय तक जीवित रहे, बल्कि स्वस्थ और खुशहाल जीवन जीएं।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कोई सोलह सौ सदस्य बन चुके है।

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