दूसरी पारी के बाद भी किसी की जिंदगी बचा सकते हैं हम

दूसरी पारी के बाद भी किसी की जिंदगी बचा सकते हैं हम Even After Our Second Innings, We Can Save Someone’s Life

13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया गया। हर साल यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे जाने के बाद भी हम किसी दूसरे व्यक्ति की जिंदगी में रोशनी छोड़ सकते हैं। लेकिन अंगदान की बात आते ही एक सवाल खासकर वरिष्ठ नागरिकों के मन में आ सकता है—क्या मेरी उम्र में भी मेरे अंग किसी के काम आ सकते हैं?

इसका जवाब है — हां, उम्र अपने आप में हमेशा बाधा नहीं है।

मृत्यु के बाद अंगदान के लिए कोई निश्चित अधिकतम आयु सीमा नहीं है। मृत्यु के समय डॉक्टर यह तय करते हैं कि कौन-से अंग या ऊतक प्रत्यारोपण के लिए उपयुक्त हैं। इसलिए 60, 70 या 80 वर्ष की उम्र में पहुंच जाना अपने आप में किसी व्यक्ति को अंगदान से बाहर नहीं करता।

यह बात वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमें खुद ही यह मानकर पीछे नहीं हट जाना चाहिए कि “अब हमारे अंग किस काम के होंगे?” चिकित्सा विज्ञान केवल उम्र नहीं, बल्कि मृत्यु के समय अंगों की वास्तविक स्थिति और उनकी उपयोगिता देखता है। यहां तक कि 70 और 80 वर्ष की उम्र के लोगों की कॉर्निया जैसी ऊतक (tissue) भी किसी की दृष्टि लौटाने में उपयोगी हो सकती हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अंगदान के महत्व को बहुत सरल शब्दों में कहा है—

एक निर्णय आपका, कई लोगों की जिंदगी बचा सकता है, जीवन दे सकता है।

प्रधानमंत्री ने 2023 में मन की बात में झारखंड की 63 वर्षीय स्नेहलता चौधरी का उदाहरण भी दिया था। उनके अंगदान से चार लोगों को अंग मिले और दो लोगों की आंखों की रोशनी लौटाने में मदद मिली। सोचिए, 63 वर्ष की एक महिला के जाने के बाद कितने लोगों की जिंदगी आगे बढ़ी।

प्रधानमंत्री ने अंगदान की भावना को एक और खूबसूरत वाक्य में व्यक्त किया—

जीवन छोड़ते हुए भी किसी का जीवन बच जाए, यही अंगदान के पीछे की सबसे बड़ी भावना है।

यह विचार वरिष्ठ नागरिकों के लिए खास मायने रखता है।

हमने अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा परिवार के लिए दिया है। बच्चों को बड़ा किया, जिम्मेदारियां निभाईं, समाज में योगदान दिया। रिटायरमेंट के बाद भी हम कहते हैं कि जिंदगी की दूसरी पारी में अभी बहुत कुछ करना बाकी है। तो क्या हमारी दूसरी पारी का योगदान हमारी मृत्यु के साथ समाप्त हो जाना जरूरी है?

क्रिकेट के महान खिलाड़ी अनिल कुंबले ने अंगदान को क्रिकेट की भाषा में बहुत खूबसूरती से समझाया है—
“जिस तरह टेस्ट मैच में दूसरी पारी महत्वपूर्ण होती है, उसी तरह जीवन में अंगदान भी महत्वपूर्ण है। एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।”

यानी एक व्यक्ति की दूसरी पारी किसी जरूरतमंद व्यक्ति की पहली पारी को आगे बढ़ा सकती है।

लेकिन अंगदान का निर्णय केवल भावुक होकर नहीं लेना चाहिए। इसके साथ कई मानसिक और पारिवारिक सवाल जुड़े होते हैं।

कुछ वरिष्ठ नागरिकों को मृत्यु के बाद अपने शरीर के बारे में सोचने में ही असहजता महसूस हो सकती है। कुछ को धार्मिक या सामाजिक संकोच हो सकता है। किसी को यह डर हो सकता है कि यदि डॉक्टरों को पता है कि वह अंगदाता है तो कहीं उसके इलाज में कोई कमी न रह जाए। और कई बार परिवार भी इस निर्णय को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं होता।

इन आशंकाओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। अंगदान स्वैच्छिक और पूरी जानकारी के बाद लिया गया व्यक्तिगत निर्णय होना चाहिए। किसी वरिष्ठ नागरिक पर परिवार, समाज या किसी संस्था का दबाव नहीं होना चाहिए।

लेकिन यदि आपने अंगदान का निर्णय लिया है तो एक काम जरूर कीजिए—अपने परिवार को बताइए।

सिर्फ पंजीकरण कराना पर्याप्त नहीं है। अपने बच्चों और निकट संबंधियों से खुलकर बात कीजिए और उन्हें अपनी इच्छा बताइए। मृत्यु के समय परिवार पहले ही भावनात्मक संकट में होता है। यदि उन्हें आपकी इच्छा पहले से पता होगी तो उस कठिन समय में निर्णय लेना उनके लिए आसान होगा।

यह भी समझना जरूरी है कि जीवित रहते हुए अंगदान और मृत्यु के बाद अंगदान अलग-अलग हैं। जीवित अंगदान में अलग चिकित्सा और कानूनी नियम लागू होते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले अधिकृत चिकित्सा संस्थान या NOTTO से सही जानकारी लेना चाहिए।

हम वरिष्ठ नागरिकों से हमेशा कहते हैं—नेवर से रिटायर्ड। रिटायरमेंट का अर्थ योगदान का अंत नहीं है। जीवन की दूसरी पारी में भी समाज के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। अंगदान शायद योगदान की सबसे अंतिम और सबसे अनोखी मिसाल है।

हमारी आंखें किसी को दुनिया दिखा सकती हैं। हमारा कोई अंग किसी दूसरे व्यक्ति को जिंदगी की नई शुरुआत दे सकता है। हमारे जाने के बाद भी किसी मां का बच्चा जीवित रह सकता है, किसी बच्चे को उसके पिता वापस मिल सकते हैं, किसी युवा को जीवन की दूसरी शुरुआत मिल सकती है।

इसलिए अंगदान को केवल मृत्यु के बारे में सोचने के रूप में न देखें। इसे जीवन को आगे बढ़ाने के संकल्प के रूप में देखें।

हमारी दूसरी पारी कब समाप्त होगी, यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन उसके बाद भी किसी की पहली पारी शुरू हो सके—यह फैसला शायद हमारे हाथ में है।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

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