अहम् वह अदृश्य बोझ है जो हमें भीतर ही भीतर परेशान करता रहता है। याद रखिए, अहम् छोड़ने का अर्थ अपनी गरिमा छोड़ना नहीं है।
सेवानिवृत्ति के बाद अधिकांश वरिष्ठजन अपने समय का सदुपयोग करने के लिए किसी सामाजिक संस्था, क्लब, धार्मिक संगठन, आरडब्ल्यूए या अपनी सोसायटी की गतिविधियों से जुड़ जाते हैं। यह एक बहुत अच्छी बात है। इससे सक्रियता बनी रहती है, नए लोगों से मिलने का अवसर मिलता है और जीवन में उद्देश्य का भाव भी बना रहता है।
इन संस्थाओं में समय-समय पर चुनाव होते हैं, नए पदाधिकारी चुने जाते हैं और विभिन्न निर्णय लिए जाते हैं। स्वाभाविक है कि हम भी अपनी राय रखते हैं, अपने पसंदीदा उम्मीदवार का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि हमारी सोच के अनुसार निर्णय हों। लेकिन यहीं एक बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। कहीं ऐसा न हो कि इन गतिविधियों में हमारी भावनाएं इतनी अधिक जुड़ जाएं कि हार-जीत, समर्थन-विरोध या निर्णयों का असर हमारी मानसिक शांति पर पड़ने लगे।
बढ़ती उम्र में सबसे बड़ी पूंजी हमारा अच्छा स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता है। यदि किसी चुनाव के परिणाम, किसी समिति के निर्णय या किसी व्यक्ति के व्यवहार के कारण हम कई दिनों तक परेशान रहें, क्रोधित रहें या अवसाद महसूस करें, तो हमें स्वयं से एक प्रश्न अवश्य पूछना चाहिए — क्या यह तनाव वास्तव में इतना महत्वपूर्ण है कि इसके लिए अपनी खुशी दांव पर लगा दी जाए?
जीवन का अनुभव हमें यह सिखाता है कि हर निर्णय हमारे अनुसार नहीं हो सकता। हर व्यक्ति हमारी बात से सहमत नहीं होगा। हर बार हमारी पसंद का व्यक्ति नहीं जीतेगा। यह जीवन का स्वाभाविक नियम है। परिपक्वता इसी में है कि हम असहमति को भी सहजता से स्वीकार करना सीखें।
वरिष्ठजनों के लिए खुशी का सबसे बड़ा रहस्य है — अपना अहम् और अनावश्यक अपेक्षाएं छोड़ देना। अहम् वह अदृश्य बोझ है जो हमें भीतर ही भीतर परेशान करता रहता है। जब हम यह सोचने लगते हैं कि “मैं ही सही हूं”, “मेरी बात ही मानी जानी चाहिए” या “मेरे बिना कुछ नहीं हो सकता”, तब तनाव का जन्म होता है। इसके विपरीत, जब हम अपनी बात कहकर परिणाम को सहजता से स्वीकार करना सीख लेते हैं, तो मन स्वतः हल्का हो जाता है।
यह बात केवल सामाजिक संस्थाओं तक सीमित नहीं है। परिवार में भी कई बार मतभेद होते हैं। बच्चों के निर्णय हमें पसंद नहीं आते, नई पीढ़ी की सोच अलग होती है और कई बार हमें लगता है कि हमारी सलाह को महत्व नहीं दिया जा रहा। यदि हर छोटी-बड़ी बात को अपने सम्मान का प्रश्न बना लिया जाए, तो रिश्तों में दूरी बढ़ने लगती है। लेकिन यदि हम थोड़ा झुकना सीख लें, सुनना सीख लें और हर बात पर प्रतिक्रिया देने के बजाय मुस्कुराकर आगे बढ़ जाएं, तो परिवार में प्रेम और अपनापन बना रहता है।
क्षमा करना भी अहम् त्यागने का ही एक रूप है। वर्षों पुरानी किसी बात को मन में लेकर चलना, किसी के प्रति नाराजगी पालना या बार-बार पुराने घावों को कुरेदना सबसे अधिक नुकसान स्वयं हमें पहुंचाता है। क्षमा करने का अर्थ भूल जाना नहीं, बल्कि अपने मन को उस बोझ से मुक्त कर देना है। जब मन हल्का होता है, तभी जीवन का आनंद लिया जा सकता है।
एक और महत्वपूर्ण बात है — अपेक्षाएं कम करना। अक्सर हमारी पीड़ा का कारण परिस्थितियां नहीं, बल्कि हमारी अपेक्षाएं होती हैं। हमें अपेक्षा रहती है कि लोग हमारा सम्मान करें, हमारी सलाह मानें, हमें हर कार्यक्रम में बुलाएं या हमारे योगदान की सराहना करें। जब ऐसा नहीं होता, तो निराशा होती है। यदि हम बिना अपेक्षा के अपना योगदान देना सीख लें, तो हर छोटी-सी सराहना भी खुशी दे जाती है।
वरिष्ठावस्था प्रतिस्पर्धा का नहीं, अनुभव बांटने का समय है। यह स्वयं को सिद्ध करने का नहीं, बल्कि स्वयं को समृद्ध करने का समय है। अब हमारा लक्ष्य हर बहस जीतना नहीं, बल्कि हर दिन मुस्कुराते हुए जीना होना चाहिए।
याद रखिए, अहम् छोड़ने का अर्थ अपनी गरिमा छोड़ना नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि हम अपनी मानसिक शांति को किसी भी विवाद से अधिक महत्व दें। जहां आवश्यक हो, अपनी बात अवश्य रखें, लेकिन यदि निर्णय हमारे अनुरूप न हो तो उसे सहजता से स्वीकार भी करें। यही जीवन की परिपक्वता है।
दूसरी पारी में सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पद, सम्मान या जीत नहीं, बल्कि मन की शांति है। जो व्यक्ति अपना अहम् हल्का कर लेता है, अपेक्षाएं सीमित कर लेता है और वर्तमान में जीना सीख लेता है, उसके लिए हर दिन एक उत्सव बन जाता है।
आइए, इस दूसरी पारी में एक छोटा-सा संकल्प लें — हर बहस नहीं जीतेंगे, लेकिन अपनी मुस्कान कभी नहीं हारेंगे। क्योंकि अंततः खुश रहना ही सबसे बड़ी सफलता है।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




