कोई दो वर्ष पूर्व मैंने एक लेख लिखा था, जिसका शीर्षक था— “वरिष्ठों के अकेलेपन को समाज दूर करे।” आज पुनः उसी विषय पर लिख रहा हूं। इसका कारण एक ऐसा समाचार है, जिसने मन को भीतर तक विचलित कर दिया। बुजुर्गों में अकेलापन आज केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में एक गंभीर समस्या बन चुका है। यह महामारी भले ही दिखाई न दे, पर इसके दुष्परिणाम किसी महामारी से कम नहीं हैं।
भारत में यह समस्या बहुत पुरानी नहीं है। इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि हमारे समाज में सदियों तक संयुक्त परिवार की परंपरा रही। परिवार के अनेक सदस्य एक साथ रहते थे और बुजुर्ग सम्मान, सुरक्षा तथा अपनापन अनुभव करते थे। समय के साथ हम पाश्चात्य जीवनशैली की ओर आकर्षित होने लगे। परिवार नियोजन के प्रसार और “हम दो, हमारे दो” जैसे नारों ने समाज की संरचना को बदल दिया। संयुक्त परिवार धीरे-धीरे एकल परिवारों में परिवर्तित होने लगे।
परिवारों में एक या दो बच्चे होने लगे तो स्वाभाविक रूप से माता-पिता का ध्यान उन्हें बेहतर से बेहतर शिक्षा दिलाने पर केंद्रित हुआ। शिक्षा पूरी होने के बाद रोजगार की तलाश में इन बच्चों को अपने छोटे शहरों और कस्बों से बाहर निकलना पड़ा। कोई विदेश चला गया तो कोई देश के महानगरों में बस गया। हम भी गर्व से कहते थे कि हमारा बेटा अमेरिका में है या बेटी किसी बड़े शहर में उच्च पद पर कार्य कर रही है। किंतु इसी उपलब्धि का एक दूसरा पक्ष भी सामने आया। जब हम स्वयं वृद्धावस्था की ओर बढ़े, तब पाया कि हम अकेले रह गए हैं। बच्चे अपनी परिस्थितियों के कारण लौट नहीं सकते और हम भी उनके वातावरण में जाकर सहज नहीं हो पाते।
स्थिति तब और कठिन हो जाती है जब जीवनसाथी भी साथ छोड़ देता है। वृद्धावस्था में अकेलापन केवल एक भावना नहीं रह जाता, बल्कि जीवन का बोझ बन जाता है। इस आयु में स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी बढ़ने लगती हैं और भावनात्मक सहारे का अभाव अधिक खलने लगता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, अकेलेपन का प्रभाव स्वास्थ्य पर इतना गंभीर हो सकता है जितना कि प्रतिदिन पंद्रह सिगरेट पीने का। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समस्या कितनी जटिल है। अकेलेपन के परिणाम भी अत्यंत चिंताजनक हैं। इससे अवसाद, चिंता और भावनात्मक तनाव बढ़ता है। अल्जाइमर और डिमेंशिया जैसी समस्याओं का खतरा भी बढ़ जाता है। हृदय रोग और अन्य शारीरिक बीमारियाँ भी इससे प्रभावित होती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का हर छठा व्यक्ति अकेलेपन का शिकार है और यह संख्या लगातार बढ़ रही है। निस्संदेह, इसे एक “खामोश महामारी” कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।
अब कुछ सकारात्मक पहलुओं पर विचार करें। प्रश्न यह है कि हम अपने बुजुर्गों को इस अकेलेपन से कैसे बचा सकते हैं? इस विषय पर मैं अपने अनेक लेखों में लिख चुका हूँ, फिर भी इसकी पुनरावृत्ति आवश्यक है।
सच तो यह है कि बुजुर्गों के अकेलेपन का समाधान बहुत महंगा या जटिल नहीं है। इसके लिए किसी विशेष उपचार की आवश्यकता भी नहीं है। आवश्यकता है तो केवल प्रेम, सम्मान और अपनत्व की। उनसे नियमित बातचीत कीजिए। उनके अनुभव सुनिए, क्योंकि उनका जीवन ज्ञान और सीख का भंडार होता है। कई बार उनके साथ बिताए गए कुछ मिनट किसी दवा से अधिक प्रभावी सिद्ध होते हैं।
आज तकनीक ने भी दूरियों को काफी हद तक कम कर दिया है। व्हाट्सऐप, वीडियो कॉल और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए बुजुर्ग अपने परिवार और मित्रों से जुड़े रह सकते हैं। देखा गया है कि वरिष्ठ नागरिकों में व्हाट्सऐप विशेष रूप से लोकप्रिय है। किंतु केवल साधन उपलब्ध होना ही पर्याप्त नहीं है। आवश्यक यह है कि बुजुर्गों के मन में संवाद करने की इच्छा बनी रहे। जब सामने वाला व्यक्ति सकारात्मकता से बात करे, अपनापन दिखाए और नियमित संपर्क बनाए रखे, तो उन्हें भी जीवन में जुड़ाव का अनुभव होता है।
एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि बुजुर्ग समाज सेवा और सामाजिक गतिविधियों से जुड़ें। सामाजिक कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी उन्हें नई मित्रताएं बनाने का अवसर देती है। हमउम्र लोगों के साथ समय बिताने और पुरानी यादें साझा करने से मन हल्का होता है और जीवन में नई ऊर्जा आती है। आज अधिकांश सोसाइटियों में वरिष्ठ नागरिक समूह बने हुए हैं, किंतु अक्सर देखा जाता है कि बड़ी संख्या में वरिष्ठ नागरिक होने के बावजूद केवल 20 से 25 प्रतिशत लोग ही इनसे जुड़ते हैं।
इस स्थिति को बदलना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। समाज, परिवार और स्वयं बुजुर्ग—तीनों को मिलकर यह प्रयास करना होगा कि वृद्धावस्था सक्रियता, सम्मान और संबंधों से भरपूर हो। आखिर जीवन के इस स्वर्णिम पड़ाव में किसी को भी अकेलापन अपना साथी न बनाना पड़े।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि अपने आसपास किसी भी बुजुर्ग को अकेला महसूस नहीं होने देंगे। कभी-कभी एक फोन कॉल, कुछ मिनट की बातचीत या स्नेह भरा साथ किसी के जीवन में फिर से उजाला भर सकता है।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।





