देश तेजी से डिजिटल हो रहा है। बिजली का बिल हो, पानी का बिल, बैंकिंग, पेंशन, के.वाई.सी., टिकट बुकिंग, अस्पताल का पंजीकरण, सरकारी योजनाओं का लाभ या किसी भी प्रकार का प्रमाणीकरण—लगभग हर काम अब मोबाइल ऐप या ऑनलाइन माध्यम से होने लगा है। यह परिवर्तन समय की आवश्यकता भी है और इससे पारदर्शिता, गति तथा सुविधा बढ़ी है।
लेकिन इस बदलाव के बीच एक प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है—क्या हमने उन वरिष्ठजनों के बारे में भी पर्याप्त सोचा है जो 75 वर्ष या उससे अधिक आयु के हैं?
यह संख्या भले बहुत बड़ी न हो, लेकिन बढ़ती जीवन प्रत्याशा के कारण ऐसे नागरिकों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें से अनेक लोग शिक्षित हैं, स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं, व्हाट्सएप पर संदेश भेजते हैं और यूट्यूब भी देखते हैं। परंतु हर ऐप का अलग तरीका, बार-बार आने वाला ओटीपी, पासवर्ड, अपडेट और विभिन्न चरणों का पालन करना उनके लिए सहज नहीं होता।
यहीं एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा—डिजिटल साक्षरता और डिजिटल निर्भरता दो अलग-अलग बातें हैं। किसी वरिष्ठजन का स्मार्टफोन चला लेना यह नहीं दर्शाता कि वह हर डिजिटल प्रक्रिया को बिना सहायता के पूरा कर सकता है।
आज अनेक घरों में यह सामान्य दृश्य है कि किसी सरकारी कार्य, बैंकिंग या ऑनलाइन प्रक्रिया के लिए वरिष्ठजन को बेटे, बेटी, पोते-पोतियों या पड़ोसियों की सहायता लेनी पड़ती है। यदि परिवार साथ न हो, तो वे असहाय महसूस करते हैं। कई बार तो आवश्यक कार्य केवल इसलिए टल जाता है क्योंकि सहायता देने वाला कोई उपलब्ध नहीं होता।
कुछ दिन पहले मैं एस.आई.आर. प्रमाणीकरण के लिए लगाए गए एक शिविर में गया। वहाँ लगभग 80 वर्ष के एक सज्जन बैठे थे। उनके चेहरे पर असमंजस साफ दिखाई दे रहा था। नियुक्त बी.एल.ओ. ने अत्यंत धैर्यपूर्वक पूरी प्रक्रिया समझाई, पर अंत में उन्हें भी यही कहना पड़ा—”आप घर जाकर किसी परिवारजन की सहायता से यह प्रक्रिया पूरी कर लीजिए।” यह घटना अपवाद नहीं, बल्कि आज की डिजिटल व्यवस्था का एक सामान्य चित्र है।
समस्या यह नहीं कि देश डिजिटल हो रहा है। समस्या यह है कि अनेक स्थानों पर केवल डिजिटल व्यवस्था ही उपलब्ध है। जब विकल्प समाप्त हो जाता है, तब सुविधा भी कई लोगों के लिए कठिनाई बन जाती है।
यदि बिजली का बिल, जलकर, हाउस टैक्स, बैंक का के.वाई.सी., पेंशन सत्यापन या अन्य आवश्यक सेवाओं के लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था न हो, तो यह उन लोगों के लिए परेशानी का कारण बन जाती है जिन्होंने जीवनभर समाज और देश के प्रति अपना योगदान दिया है।
सरकार का उद्देश्य भ्रष्टाचार कम करना, पारदर्शिता बढ़ाना और सेवाओं को सरल बनाना है। यह पूरी तरह स्वागतयोग्य है। परंतु समान रूप से आवश्यक यह भी है कि वरिष्ठ नागरिकों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए व्यवस्था को अधिक समावेशी बनाया जाए।
इसके लिए कुछ व्यावहारिक कदम उठाए जा सकते हैं—
- प्रत्येक सरकारी कार्यालय में वरिष्ठ नागरिक सहायता काउंटर हो।
- जहाँ संभव हो, डिजिटल प्रक्रिया के साथ ऑफलाइन विकल्प भी उपलब्ध रहे।
- समय-समय पर मोहल्लों और ग्रामों में डिजिटल सहायता शिविर लगाए जाएँ।
- प्रशिक्षित स्वयंसेवक या अधिकृत सहायक आवश्यकता पड़ने पर वरिष्ठजनों के घर जाकर डिजिटल कार्यों में सहायता दें।
- सभी सरकारी ऐप और वेबसाइटों में Senior Citizen Mode विकसित किया जाए, जिसमें बड़े अक्षर, सरल भाषा और कम चरणों वाली प्रक्रिया हो।
यह आवश्यकता केवल सरकारी सेवाओं तक सीमित नहीं है। निजी क्षेत्र में भी अस्पताल, बैंक, बीमा, गैस, दूरसंचार और अन्य अनेक सेवाएं तेजी से पूरी तरह डिजिटल होती जा रही हैं। यदि इन संस्थाओं में भी वरिष्ठजनों के लिए सहायता-युक्त या वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध हो, तो वे सम्मानपूर्वक इन सेवाओं का लाभ उठा सकेंगे। यह उनकी क्षमता का नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता का प्रश्न है।
हमें याद रखना चाहिए कि किसी भी आधुनिक व्यवस्था की सफलता केवल उसकी तकनीकी दक्षता से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से भी कि वह समाज के सबसे कमजोर या सबसे अधिक सहायता की आवश्यकता वाले वर्ग के लिए कितनी उपयोगी है। वरिष्ठजन सुविधा नहीं, सम्मान चाहते हैं; विशेषाधिकार नहीं, बल्कि समान अवसर चाहते हैं।
हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जो डिजिटल रूप से सशक्त हो। उतना ही आवश्यक है कि वह मानवीय दृष्टि से भी संवेदनशील रहे। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को सक्षम बनाना है, उसे असहाय बनाना नहीं।
हम एक ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जो डिजिटल रूप से सशक्त हो। उतना ही आवश्यक है कि उसकी हर व्यवस्था में मानवीय स्पर्श भी बना रहे। तकनीक का उद्देश्य मनुष्य को सक्षम बनाना है, उसे असहाय बनाना नहीं।
डिजिटल भारत की सफलता केवल नई तकनीक से नहीं मापी जाएगी, बल्कि इस बात से भी कि 75 वर्ष का एक वरिष्ठ नागरिक बिना असहाय महसूस किए अपनी आवश्यक सेवाओं का लाभ कितनी सहजता से ले सकता है। विकास तभी सार्थक है, जब वह सबसे अनुभवी नागरिक को भी साथ लेकर चले।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




