बुजुर्ग व्यक्तियों को याद होगा कि जब कोई व्यक्ति साठ वर्ष की आयु पार कर लेता था, तो अक्सर मजाक में कहा जाता था—”अरे, यह तो सठिया गया है।” इसका अर्थ यही होता था कि उसकी बातों को अधिक गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अब पुरानी सोच या आदतों की बातें करेगा।
समय बदल रहा है। आज साठ वर्ष की आयु जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जाती है। लोग सत्तर-पचहत्तर वर्ष तक सक्रिय रहते हैं, काम करते हैं, समाज में योगदान देते हैं और नई चीजें सीखते हैं। फिर भी एक उम्र के बाद कई बार वरिष्ठ जनों को यह महसूस होने लगता है कि परिवार के युवा सदस्य उनकी बातों को पहले जैसा महत्व नहीं दे रहे हैं। वे सीधे कुछ कहें या न कहें, लेकिन उनके व्यवहार से यह संकेत मिल जाता है।
ऐसी स्थिति में केवल शिकायत करने से कुछ नहीं बदलता। बेहतर होगा कि हम स्वयं भी अपनी कुछ आदतों पर विचार करें और आवश्यक सुधार करें।
सबसे पहले हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि क्या हम हर समय केवल सलाह ही देते रहते हैं? क्या हमारी बातचीत का अधिकांश हिस्सा यह बताने में बीतता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। अनुभव बांटना अच्छी बात है, लेकिन हर समय उपदेश देना कई बार सामने वाले को बोझिल लगने लगता है।
इसके साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि हम अपनी बात किस प्रकार कहते हैं। वही बात यदि आदेश या डांट के स्वर में कही जाए तो उसका प्रभाव अलग होता है, और यदि प्रेमपूर्वक, सहजता से कही जाए तो उसका प्रभाव बिल्कुल अलग होता है। शब्दों से अधिक महत्व हमारे बोलने के तरीके का होता है।
एक और आदत जिस पर हमें विशेष ध्यान देना चाहिए, वह है सुनने की कला। कई बार जब युवा अपनी बात रख रहे होते हैं, तब हम उनकी बात पूरी होने से पहले ही बीच में टोक देते हैं। हमें लगता है कि हमारा अनुभव अधिक है और हमें पहले से ही पता है कि सामने वाला क्या कहने वाला है। लेकिन ऐसा करने से सामने वाले को यह संदेश जाता है कि उसकी बातों का कोई मूल्य नहीं है।
हमें यह आदत विकसित करनी चाहिए कि पहले पूरी बात ध्यान से सुनें, फिर अपनी राय दें। हो सकता है कि हम सामने वाले से सहमत न हों, लेकिन उसे अपनी बात कहने का अवसर अवश्य मिलना चाहिए।
परिवार में जब किसी विषय पर चर्चा हो रही हो और आप सबसे वरिष्ठ सदस्य हों, तब आपकी भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। आपकी बॉडी लैंग्वेज, आपके चेहरे के भाव और आपकी प्रतिक्रिया सभी को दिखाई देती है। यदि आप दूसरों की बातों को ध्यान से सुनते हैं, तो परिवार के अन्य सदस्य भी एक-दूसरे को सुनना सीखते हैं। वरिष्ठ व्यक्ति का व्यवहार पूरे परिवार के वातावरण को प्रभावित करता है।
कई बार चर्चाएं बहस का रूप भी ले लेती हैं। ऐसी परिस्थितियों में धैर्य सबसे बड़ी ताकत बन जाता है। यदि हम तुरंत उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया देते हैं, तो विवाद और बढ़ जाता है। इसके विपरीत यदि हम शांत रहकर बात करें, तो तनाव स्वतः कम होने लगता है। यह याद रखना चाहिए कि गुस्से में लिए गए निर्णय अक्सर गलत साबित होते हैं, जबकि शांत मन से लिया गया निर्णय अधिक संतुलित होता है।
एक और महत्वपूर्ण बात है अपनी गलती स्वीकार करना। यह हम सभी के लिए कठिन होता है। कई बार हमें भीतर से पता होता है कि हम गलत हैं, लेकिन हम उसे स्वीकार नहीं करना चाहते। हम अपनी बात को सही साबित करने के लिए तर्क देते रहते हैं। इससे स्थिति सुधरने के बजाय और बिगड़ जाती है।
वास्तव में, अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं बल्कि परिपक्वता का संकेत है। जब वरिष्ठ व्यक्ति खुले मन से कहता है—”हां, मुझसे गलती हुई”—तो उसका सम्मान कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है। इससे परिवार के युवा सदस्यों को भी सीख मिलती है कि गलती मानना जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है।
इसके अतिरिक्त हमें नई पीढ़ी की सोच को समझने का भी प्रयास करना चाहिए। समय बदल चुका है। तकनीक, कार्यशैली और जीवन के तरीके पहले जैसे नहीं रहे। हर नई बात को गलत कहने के बजाय यदि हम उसे समझने का प्रयास करें, तो पीढ़ियों के बीच की दूरी काफी कम हो सकती है।
अंततः सुखमय वरिष्ठ जीवन का रहस्य केवल अच्छे स्वास्थ्य या आर्थिक सुरक्षा में नहीं छिपा है। उसका एक बड़ा आधार हमारे संबंध हैं। यदि हम विनम्रता, धैर्य, सुनने की आदत, सकारात्मक सोच और अपनी गलतियों को स्वीकार करने का साहस विकसित कर लें, तो हमारे सुनहरे वर्ष वास्तव में और अधिक सुनहरे बन सकते हैं।
उम्र बढ़ना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन उम्र के साथ स्वयं को बेहतर बनाना निश्चित रूप से हमारे हाथ में है। सुनहरे वर्ष अपने आप नहीं आते, उन्हें अपने व्यवहार, सोच और आदतों से सुनहरा बनाना पड़ता है।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




