रिटायरमेंट के बाद रोजगार की चुनौतियां और समाधान

रिटायरमेंट के बाद रोजगार की चुनौतियां और समाधान Getting Employed Post Retirement Need More Than Experience

कुछ परिचित व्यक्तियों के साथ पिछले दिनों बैठा था। गप्प-शप चल रही थी। एक व्यक्ति, जो शहर की एक प्रसिद्ध स्वयंसेवी संस्था यानी एनजीओ से जुड़ा था, कहने लगा कि संस्था को एक एकाउंटेंट की आवश्यकता है। उसने सभी से आग्रह किया कि यदि किसी की नजर में कोई नौकरी पाने का इच्छुक व्यक्ति हो तो उसे तुरंत भेजें।

बातों-बातों में उसने बताया कि कम आयु वाले लोग एनजीओ का नाम सुनते ही ज्यादा रुचि नहीं दिखाते। उनका मानना होता है कि वहां करियर ग्रोथ या भविष्य की संभावनाएं सीमित हैं।

मैंने सहज सुझाव दिया कि किसी सेवानिवृत्त व्यक्ति को तलाशने का प्रयास करें। वह संभवतः कम मेहनताना भी मांगेगा, अनुभव भी होगा और काम के प्रति गंभीरता भी।

मेरे सुझाव पर उन्होंने जो प्रतिक्रिया दी, वह सोचने पर मजबूर करने वाली थी। उनका कहना था कि कई बार बड़े उम्र के सेवानिवृत्त व्यक्तियों के साथ काम करना आसान नहीं होता। उनमें पहले वाले पद और प्रतिष्ठा की अपेक्षा बनी रहती है। कई लोग नई कार्यशैली के अनुरूप स्वयं को ढालने में कठिनाई महसूस करते हैं। कुछ लोग अपने जूनियर आयु वाले अधिकारियों से निर्देश लेने में सहज नहीं होते। कई बार उनमें लचीलापन कम दिखाई देता है।

उनकी बात सुनकर लगा कि यदि हम वरिष्ठजनों के पुनर्नियोजन यानी रिइम्प्लॉयमेंट की बात करते हैं, तो केवल अवसर पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा। हमें इस पर भी गंभीरता से विचार करना होगा कि वरिष्ठ नागरिक स्वयं को बदलती कार्य संस्कृति के लिए कैसे तैयार करें।

आज कार्यस्थलों की दुनिया तेजी से बदल रही है। तकनीक बदल रही है। काम करने के तरीके बदल रहे हैं। डिजिटल कौशल लगभग हर क्षेत्र में आवश्यक हो गए हैं। ऐसे में केवल पुराना अनुभव पर्याप्त नहीं रह जाता।

सेवानिवृत्ति के बाद यदि कोई व्यक्ति पुनः काम करना चाहता है, तो उसे स्वयं को समय के अनुसार तैयार करना होगा। रिस्किलिंग और अपस्किलिंग आज केवल युवाओं के लिए नहीं, बल्कि वरिष्ठजनों के लिए भी उतनी ही आवश्यक हो गई है।

रिस्किलिंग का अर्थ है नई क्षमता सीखना। उदाहरण के लिए, एक पारंपरिक अकाउंटेंट को डिजिटल अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर सीखने की आवश्यकता पड़ सकती है। अपस्किलिंग का अर्थ है पहले से मौजूद कौशल को आधुनिक जरूरतों के अनुसार मजबूत करना।

आज ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम, डिजिटल लर्निंग प्लेटफॉर्म और छोटे-छोटे कौशल पाठ्यक्रम आसानी से उपलब्ध हैं। वरिष्ठजन यदि सीखने की मानसिकता बनाए रखें, तो रोजगार के अवसर काफी बढ़ सकते हैं।

लेकिन केवल तकनीकी कौशल पर्याप्त नहीं हैं। मानसिक तैयारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

रिटायरमेंट के बाद यदि हम पुनः कार्यक्षेत्र में लौटना चाहते हैं, तो कुछ बातों को स्वीकार करना होगा। हो सकता है पद पहले जैसा न हो। आय पहले जैसी न हो। निर्णय लेने की भूमिका सीमित हो। कभी-कभी कम आयु वाले व्यक्ति भी मार्गदर्शन दें। यह सब सहजता से स्वीकार करना होगा।

दूसरी पारी पहली पारी की पुनरावृत्ति नहीं होती। वह एक नई शुरुआत होती है।

वरिष्ठजनों के पास अनुभव, धैर्य, ईमानदारी और जीवन की परिपक्व समझ जैसी अनमोल पूंजी होती है। यदि इसके साथ सीखने की इच्छा, लचीलापन और सकारात्मक दृष्टिकोण जुड़ जाए, तो रोजगार के नए अवसर अवश्य खुल सकते हैं।

पुनर्नियोजन का लाभ केवल आर्थिक नहीं होता, हालांकि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सेवानिवृत्ति के बाद काम से जुड़े रहने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि व्यक्ति अपने समय का सार्थक उपयोग कर पाता है। खालीपन, अकेलापन और निरर्थकता की भावना कम होती है। कार्यस्थल पर लोगों से मिलने-जुलने का अवसर मिलता है, जिससे सामाजिक दायरा बना रहता है। व्यक्ति को लगता है कि उसकी योग्यता और अनुभव आज भी उपयोगी हैं। यह एहसास आत्मविश्वास बढ़ाता है और जीवन में उद्देश्य का भाव बनाए रखता है। घर में भी सक्रिय और व्यस्त वरिष्ठजनों को अलग नजरिये से देखा जाता है। उन्हें सम्मान और महत्व मिलने का भाव मजबूत होता है। मानसिक और सामाजिक रूप से सक्रिय रहने वाले वरिष्ठजन प्रायः अधिक प्रसन्न, ऊर्जावान और सकारात्मक जीवन जीते हैं। काम केवल आय का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन में ऊर्जा और आत्मसम्मान बनाए रखने का भी माध्यम बन सकता है।

समाज को भी अपनी सोच बदलनी होगी। वरिष्ठजन केवल सहानुभूति नहीं चाहते, अवसर चाहते हैं।

रिटायरमेंट का अर्थ काम समाप्त होना नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि अब हमें अपनी दूसरी पारी के लिए स्वयं को नए तरीके से तैयार करना होगा।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

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