Shri Piyush Goyal, Minister of Commerce & Industry, Government of India[/caption]
Dear Shri Vijay,
I would like to take this opportunity to acknowledge the significant impact you've made through the Never Say Retired initiative. Your efforts have provided a valuable platform for senior citizens, encouraging them to stay active, engaged and continue contributing to society in meaningful ways. By challenging the traditional concept of retirement, you've introduced a new perspective that values the wisdom and experience of the older generation.
The work you've done to empower senior citizens reflects your belief that age should not be a barrier to continued growth and contribution. Through this initiative, you've not only fostered a sense of purpose among individuals but also helped create a more inclusive environment where they can share their knowledge, mentor others and remain active in the community.
Moreover, your involvement in various social and cultural projects, along with your work in organizations such as Ekal Vidyalaya Foundation and Param Shakti Peeth, showcases your commitment to both social welfare and nation-building. These efforts speak to your vision of a society where every individual, regardless of age, has the opportunity to contribute and thrive.
As you continue your work, I wish you continued success in all your future endeavors. May your journey ahead be filled with more opportunities to inspire, empower and create positive change.
With warm regards,
Sincerely,Piyush Goyal
Shri Piyush Goyal Minister of Commerce & Industry, Government of India 10-July-2025
जय श्री राम विजय मारू जी। आपका यह प्रयास वरिष्ठ नागरिको की ऊर्जा का सदुपयोग अत्यंत प्रशंसनीय हैं और शास्त्रीय हैं। हमारे सनातन धर्म में ब्रह्मचर्य, ग्रहस्त, वानप्रस्थ और सन्यास चार आश्रमो की व्यवस्था हैं। भगवान के आदेश के अनुसार 50 वर्ष के बाद ही व्यक्ति को समाज सेवा और साधना में लग जाना चाहिए। ठीक है, फिर भी गोवर्नमेंट के अनुसार लोग 60 वर्ष में रिटायर होते हैं। लेकिन आज के समय में अधिकांश लोग उसके बाद भी स्वस्थ एवं कार्य करने लायक होते हैं। उनकी ऊर्जा का सदुपयोग कर्म की दृष्टि से सेवा में हो, मन की द्रष्टी से भक्ति में हो और बुद्धि की दृष्टि से सत्य के साक्षात्कार के लिए हो। इन तीनों कार्य का विधान हमारे शास्त्र में है और वही कार्य आप करवा रहे हैं। अगर वेदांत चिंतन समझ में नहीं आता है तो भगवान की भक्ति करें और भक्ति में भी मन नहीं लगता है तो निस्वार्थ भाव से समाज की, देश की, राष्ट्र की सेवा करें। यही क्रम है ईश्वर की अनुभूति का। निस्वार्थ सेवा ही साधना होती है, ऐसा हमारे पू्ज्य रोटी राम बाबा कहते थे। तो जो लोग 60 वर्ष के बाद भी अपनी उर्जा को राष्ट्र सेवा के लिए, समाज सेवा के लिए अगर निस्वार्थ भाव से उपयोग करते हैं तो उनको ईश्वर की अनुभूति के लिए अलग से साधना की भी आवश्यकता नहीं है। उनके निस्वार्थ सेवा ही साधना बन जाएगी। सेवा में दो बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। जैसा कि हनुमान जी के जीवन से हम लोग सीखते हैं। सेवा कार्य हमको अगर मिला है, शरीर स्वस्थ है, अभिमान न करें कि हम ही सेवा कर रहे हैं। ईश्वर हमसे करवा रहा है यह सोच रखें और जहां भी सेवा में बाधा पड़े वहां चिंता ना कर के चिंतन करें। यह हनुमान जी के जीवन से हमको सीखने को मिलता है। इसीलिए वह सेवा कार्य में हमेशा सफल रहते थे। आपका कार्य अत्यंत प्रशंसनीय है। बहुत-बहुत आशीर्वाद, साधुवाद। जय श्री राम। जय मां नर्मदे।
Swami Girishanand Saraswati Vrindavan 17-January-2023
आदरणीय विजय भैया!
मैं मंत्र मुग्ध हूँ कि आपने वर्तमान काल की सबसे बड़ी आवश्यकता की मुहिम प्रारम्भ की है। एकल में तो वानप्रस्थी योजना का महत्व गत अनेक वर्षों से चर्चा में है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपकी मुहिम से वह कल्पना साकार होगी। यदि कोई भी सेवानिवृत पुरुष या महिला दिन में 3-4 घंटे का समय दे सकते हैं तो उनका योगदान इतिहास याद करेगा। अपने केंद्र पर ही कार्यालय के काम की देखभाल से एकल अभियान में एक चमक आ सकती है। और बाकी तो सब काम फ़ोन द्वारा ही अपेक्षित है।
मैं राम जी के चरणों में आपकी मुहिम की सफलता की प्रार्थना कर रहा हूँ।
श्याम जी गुप्त, प्रणेता, एकल अभियान 21-May-2021
विजय जी आपको इस पवित्र कार्य के लिए बहुत-बहुत बधाई देती हूं। हमारे प्राचीन भारत में भी जीवन के उत्तरार्ध जोकि वानप्रस्थाश्रम कहलाता है जब व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाता है। उसके लिए एक मार्ग होता है अपनी उर्जा के सदुपयोग के साथ साथ ,"आत्म अनुसंधान" के लिए साधना रत होना। शरीर की ऊर्जा सदैव समाज के लिए समर्पित होती है और चित् चेतना "परम सत्य" की खोज में समर्पित होती है और मन "श्री हरि" के चरणों में समर्पित होता है। इसको ऐसे कह सकते हैं:
जग की सेवा खोज अपनी प्रेम हरि से कीजिए जिंदगी का राज है यह जानकर जी लीजिए साधना की राह पर साधन किसी का है दिया मैं नहीं मेरा नहीं ये तन किसी का है दिया जो भी अपने पास है वह धन किसी का है दिया।
देह की मृत्यु के आने से पहले व्यक्ति के जीवन में सन्यास स्वयं ही घटित हो जाता है। आपने उसी दृष्टि को अपने इस कार्य के माध्यम से स्थापित किया है। आपने बिल्कुल सही कहा बिना उद्देश्यों को समर्पित हुई उर्जा कुंठित ही होती है और वैसे भी बिना व्यक्तिगत लाभ के समाज के कार्य में लगना समाज की ही जिम्मेदारी होती है। राष्ट्र का कार्य राज्य क्यों करें राष्ट्र का कार्य राष्ट्र के निवासी ही करें। यह बहुत सुंदर पहल है आपको बहुत-बहुत साधुवाद।
दीदी माँ साध्वी ऋतंभरा, वात्सल्य ग्राम, वृंदावन 21-May-2021





