वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दे

Seniors, Never Let Your Inner Faith Weaken वरिष्ठजन, मन का विश्वास कम न होने दे

हम सभी को एक अत्यंत सुंदर और भावपूर्ण भजन अवश्य याद होगा, जिसे हम अपने बालपन से सुनते आ रहे हैं— “इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना।” इन दो पंक्तियों में जीवन का सार छिपा हुआ है। आज के समय में, और विशेष रूप से हम वरिष्ठजनों के लिए, यह पंक्तियां किसी संबल से कम नहीं हैं। आयु कितनी ही क्यों न बढ़ गई हो, यदि अपने ऊपर विश्वास बना हुआ है, तो जीवन की राह कभी पूरी तरह कठिन नहीं होती। विश्वास ही वह शक्ति है जो हमें गिरने के बाद फिर खड़ा होना सिखाती है।

भगवान से हमारी यह प्रार्थना होनी चाहिए कि वे हमें इस विश्वास के पथ से भटकने न दें। जीवन की संध्या में जब शरीर कुछ सीमाएं तय करने लगता है, तब मन का मजबूत रहना और भी आवश्यक हो जाता है। यदि मन हार गया, तो सबसे बड़ा पराजय वहीं हो जाती है। लेकिन यदि मन ने कहा—“मैं कर सकता हूं, मैं सीख सकता हूं, मैं आगे बढ़ सकता हूं”—तो उम्र केवल एक संख्या बनकर रह जाती है।

इस भजन की अगली पंक्तियां भी उतनी ही गहरी हैं— “हम चले नेक रास्ते पर, हमसे भूल कर भी कोई भूल हो ना।” इसे अपने जीवन में उतारना आसान नहीं है। मनुष्य होने के नाते हमसे भूलें होती रही हैं और आगे भी हो सकती हैं। परंतु जीवन के इस पड़ाव पर, जब हमने अनेक अनुभवों से बहुत कुछ सीखा है, तब यह प्रयास तो अवश्य होना चाहिए कि हमारी भूलें कम से कम हों। यही वे सुनहरे वर्ष हैं जब हमें अत्यंत संयम, संतुलन और विवेक के साथ जीना है।

यह वह समय है जब हम अपने से छोटे लोगों को उपदेश देने के बजाय, अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करें। हमने जो कुछ भी जीवन में अर्जित किया है—ज्ञान, अनुभव, समझ और धैर्य—उसे बांटना ही वरिष्ठ होने का सबसे बड़ा धर्म है। आज की पीढ़ी के पास तकनीक है, गति है, लेकिन अनुभव की वह गहराई नहीं जो उम्र के साथ आती है। यदि हम शांत भाव से, बिना अहंकार के, अपने अनुभव साझा करें, तो समाज को उसका बड़ा लाभ मिल सकता है।

भजन की आगे की पंक्तियां भी हम वरिष्ठजनों के लिए एक स्पष्ट संदेश देती हैं— “अज्ञान के अंधेरे से दूर रहे, ज्ञान की रोशनी हमें दे।” अक्सर यह मान लिया जाता है कि बढ़ती उम्र में सीखने की आवश्यकता नहीं रहती। यह सोच न केवल गलत है, बल्कि खतरनाक भी है। सीखना बंद करते ही व्यक्ति भीतर से जड़ हो जाता है। आज के समय में थोड़ी सी अज्ञानता भी हमें भारी नुकसान पहुंचा सकती है—चाहे वह ऑनलाइन फ्रॉड हो, गलत स्वास्थ्य सलाह हो या भ्रामक सूचनाएं।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम आज भी सीखते रहें। नई तकनीक से डरने के बजाय, उसे समझने का प्रयास करें। प्रश्न पूछने में संकोच न करें। यह स्वीकार करना कि “मुझे नहीं पता” कमजोरी नहीं, बल्कि सीखने की पहली सीढ़ी है। जब हम ज्ञान की रोशनी को अपने जीवन में प्रवेश करने देते हैं, तब अज्ञान का अंधेरा स्वतः ही दूर हो जाता है।

भजन में आगे कहा गया है कि हम हर बुराई से बचकर रहें और हमारी शेष जीवन-यात्रा भली हो। यह संदेश अत्यंत सरल है, पर उसका पालन उतना ही गहन है। मन में किसी के प्रति द्वेष न हो, बदले की भावना न आए, और यह भावना भी न पनपे कि किसी ने हमारे साथ अन्याय किया है। जीवन बहुत छोटा है इन भावनाओं में उलझने के लिए। शांति और क्षमा ही इस अवस्था के सबसे बड़े आभूषण हैं।

यह सोचने के बजाय कि हमें जीवन से क्या मिला, यह विचार करना अधिक सार्थक है कि हमने जीवन को क्या दिया। अंततः कवि की यही कामना है कि सभी का जीवन मधुबन बन जाए—जहां मधुरता हो, सौहार्द हो और संतोष हो। इससे सुंदर कल्पना और क्या हो सकती है?

पुराने भजन हों या गीत, ऐसा लगता है कि उस समय के रचनाकार शब्दों के माध्यम से आत्मा को स्पर्श करना जानते थे। उनकी रचनाओं में संदेश भी होता था और संवेदना भी। आज भी यदि हम उन पंक्तियों को अपने जीवन में उतार लें, तो बहुत सी उलझनें अपने आप सुलझ सकती हैं।

अंत में, एक बार फिर यही दोहराना चाहूंगा कि हम वरिष्ठजन हर परिस्थिति में अपने मन को मजबूत रखें। यह जीवन की एक सच्चाई है कि जब हम स्वयं पर विश्वास करना नहीं छोड़ते, तब परिस्थितियां भी धीरे-धीरे हमारा साथ देने लगती हैं। जितना अधिक विश्वास हम अपने भीतर जगाएंगे, जीवन की राह उतनी ही सरल और सुखद होती चली जाएगी। यही नेवर से रिटायर्ड अभियान का मूल संदेश है—जीवन के अंतिम क्षण तक विश्वास, उद्देश्य और सक्रियता के साथ जीना।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *