वरिष्ठजन जब अपने अनुभवों के साथ मार्गदर्शन के लिए किसी युवा का हाथ थामते हैं, तो केवल एक व्यक्ति नहीं संवरता—एक सोच, एक परिवार और अंततः एक समाज दिशा पाता है। जीवन के लंबे सफर में सीखे गए सबक, देखे गए संघर्ष और अर्जित की गई समझ कोई साधारण पूंजी नहीं होती। यह वह धरोहर है, जो बांटी जाए तो पीढ़ियों को समृद्ध कर सकती है। फिर भी विडंबना यह है कि आज की तेज रफ्तार दुनिया में यह अमूल्य निधि अक्सर अनसुनी और अनदेखी रह जाती है।
आज हम बार-बार यह कहते हैं कि युवाओं में मूल्यों का क्षरण हो रहा है। रिश्तों में गर्माहट कम हो रही है, धैर्य घट रहा है और तात्कालिक सफलता को ही जीवन का अंतिम लक्ष्य मान लिया गया है। असफलता को स्वीकार करने की क्षमता कम होती जा रही है। इन सबके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं, पर एक सच्चाई यह भी है कि पीढ़ियों के बीच संवाद कम होता जा रहा है। जब यह संवाद टूटता है, तो अनुभव और ऊर्जा के बीच की स्वाभाविक कड़ी भी कमजोर पड़ जाती है। यहीं वरिष्ठजनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।
वरिष्ठ अपने साथ केवल स्मृतियां नहीं लाते, वे इतिहास को जीवंत रूप में लेकर आते हैं। उन्होंने अभाव के दिन देखे हैं, धीरे-धीरे मिली सफलताओं का स्वाद चखा है और असफलताओं से उबरने की कला सीखी है। वे जानते हैं कि जीवन में हर समस्या का समाधान तुरंत नहीं मिलता और हर रात के बाद सुबह अवश्य होती है। जब वे यह सब किसी युवा से साझा करते हैं, तो वह केवल प्रेरित नहीं होता—वह जीवन को समझना सीखता है।
संस्कृति और मूल्यों की बात करें तो वरिष्ठजन इसके सबसे सशक्त वाहक हैं। संस्कृति केवल त्योहारों या परंपराओं तक सीमित नहीं होती; यह दूसरों के प्रति संवेदना, बड़ों के प्रति सम्मान, और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से बनती है। ये मूल्य भाषणों से नहीं, बल्कि आचरण से सिखाए जाते हैं। जब कोई युवा अपने दादा-दादी या किसी वरिष्ठ को जीवन को गरिमा और संतुलन के साथ जीते देखता है, तो वह अनजाने ही बहुत कुछ सीख लेता है।
आज तकनीक ने हमें सुविधाएं तो दी हैं, पर मानवीय संपर्क कम कर दिया है। ऑनलाइन खरीदारी ने दुकानदार से होने वाली सहज बातचीत भी छीन ली है। सोशल मीडिया ने संपर्क बढ़ाया है, पर रिश्तों की गहराई कम की है। ऐसे समय में वरिष्ठजनों की संबंध-निर्माण की क्षमता युवाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है। वे जानते हैं कि रिश्ते समय, विश्वास और निरंतर संवाद से बनते हैं—लाइक्स और फॉलोअर्स से नहीं।
जीवन कौशलों की शिक्षा में भी वरिष्ठों का कोई विकल्प नहीं है। धैर्य, संयम, भावनात्मक संतुलन, आर्थिक विवेक और निर्णय क्षमता—ये सब अनुभव से उपजते हैं। बड़े-बड़े संस्थान इन्हें सैद्धांतिक रूप से सिखा सकते हैं, पर जीवन में उतारने की कला वरिष्ठ ही सिखा सकते हैं। कई बार एक साधारण-सी सलाह, जो अनुभव से निकली हो, जीवन की दिशा बदल देती है।
आज का युवा मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अनिश्चित भविष्य के भय से जूझ रहा है। बहुतों के पास अपनी बात कहने वाला कोई नहीं है। ऐसे समय में किसी वरिष्ठ का शांत स्वर, बिना जजमेंट के सुनने का धैर्य और स्नेहपूर्ण मार्गदर्शन किसी औषधि से कम नहीं होता। वरिष्ठ केवल सलाह नहीं देते—वे भरोसा देते हैं कि जीवन को जिया जा सकता है।
समाज को अब यह समझना होगा कि वरिष्ठजन बोझ नहीं, बल्कि अमूल्य संसाधन हैं। उन्हें केवल सहायता पाने वाला वर्ग मानने के बजाय, ज्ञान देने वाला वर्ग मानना होगा। विद्यालयों, सामाजिक मंचों और सामुदायिक संस्थाओं में वरिष्ठों की भागीदारी को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
वरिष्ठों के लिए भी मेंटरशिप एक नया अर्थ लेकर आती है। यह उन्हें यह एहसास दिलाती है कि सेवानिवृत्ति का अर्थ निष्क्रियता नहीं है। जीवन का यह चरण भी उतना ही उपयोगी और सार्थक हो सकता है। यही “नेवर से रिटायर्ड” की आत्मा है—जहां अनुभव रुकता नहीं, बल्कि और अधिक उजाला फैलाता है।
यदि हम वरिष्ठजनों के अनुभव और मार्गदर्शन को अपनाएं, तो हम केवल युवाओं का भविष्य नहीं संवारेंगे, बल्कि एक संवेदनशील, संतुलित और मजबूत समाज की नींव रखेंगे। अपने वरिष्ठों को सुनना, सम्मान देना और अवसर देना—यही हमारे प्रिय भारत को सच्चे अर्थों में सशक्त बनाएगा।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




