आज हम एक ऐसी दुनिया में जी रहे हैं, जहां हमारे दोस्त, रिश्तेदार और परिचित केवल हमारे आसपास ही नहीं, हमारे मोबाइल फोन में भी रहते हैं। सुबह उठते ही वाट्सएप के संदेश, फेसबुक की पोस्ट और इंसाटाग्राम के अपडेट हमारा इंतजार कर रहे होते हैं। कई बार तो लगता है कि हम अकेले हैं ही नहीं — हमारे साथ हर समय सैकड़ों लोग जुड़े हुए हैं।
लेकिन जरा ठहरकर सोचिए — क्या सचमुच ऐसा है?
यह बात केवल युवाओं को समझने की जरूरत नहीं है। वरिष्ठ नागरिक भी कभी-कभी इस भ्रम में रहने लगते हैं कि इतने वाट्सएप ग्रुप हैं, फेसबुक पर इतने मित्र हैं और इतने लोगों से रोज बातचीत होती है, तो फिर अकेलापन कैसा?
वास्तविकता थोड़ी अलग है।
किसी व्यक्ति के फेसबुक पर हजारों या लाखों फोलोअर्स हो सकते हैं। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि वे सभी उसके मित्र हैं। बल्कि यह भी जरूरी नहीं कि वे उसके हर पोस्ट को देखते हों। असली बात फोलोअर्स की संख्या नहीं, बल्कि यह है कि कितने लोग वास्तव में आपकी बात पढ़ते हैं, समझते हैं और उससे जुड़ते हैं।
यही बात वरिष्ठ नागरिकों पर भी लागू होती है। हमें यह देखकर खुश नहीं होना चाहिए कि हमारे वाट्सएप में सैकड़ों कॉनटेक्ट्स हैं या हम कई ग्रुपों के सदस्य हैं। सवाल यह है कि इनमें से कितने लोग ऐसे हैं जिन्हें हम जरूरत पड़ने पर फोन कर सकते हैं और जो हमारी आवाज सुनकर सचमुच खुश होंगे?
वाट्सएप बुरा नहीं है। बल्कि वरिष्ठ नागरिकों के लिए तो यह बहुत उपयोगी माध्यम है। परिवार से जुड़े रहने, पुराने परिचितों से संपर्क बनाए रखने, तस्वीरें और शुभकामनाएँ भेजने और समय-समय पर बातचीत करने का यह आसान साधन है। कई बुजुर्गों के लिए यह मनोरंजन और समय बिताने का भी अच्छा माध्यम बन गया है।
लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब वर्चुअल संबंध, वास्तविक संबंधों की जगह लेने लगते हैं।
हममें से अधिकांश ने इसका अनुभव किया होगा। वर्षों बाद कोई पुराना दोस्त अचानक सामने मिल जाए तो बातचीत शुरू होते ही जैसे समय पीछे लौट जाता है। स्कूल-कॉलेज के दिन, नौकरी के शुरुआती वर्ष, पुरानी यात्राएं, साझा मित्र, शरारतें और न जाने कितनी पुरानी बातें याद आने लगती हैं। एक बात से दूसरी बात निकलती जाती है और देखते-देखते घंटों कैसे बीत गए, पता ही नहीं चलता।
वाट्सएप पर ऐसा अनुभव कहां मिलता है? वहां हम संदेश भेजते हैं, सामने वाला पढ़ता है और कभी जवाब देता है, कभी केवल एक ईमोजी भेज देता है। बातचीत चल भी जाए तो उसमें वह गर्माहट कहां होती है जो आमने-सामने बैठकर बात करने में होती है?
एक और महत्वपूर्ण अंतर है—चेहरे के भाव और आवाज का उतार-चढ़ाव। जब हम सामने बैठकर किसी से बात करते हैं तो हमारे चेहरे के भाव, आँखों की चमक, मुस्कान, आवाज का उतार-चढ़ाव और कभी-कभी हमारी चुप्पी भी बहुत कुछ कह देती है। सामने वाला कई ऐसी बातें समझ जाता है जिन्हें हमने शब्दों में कहा ही नहीं।
इसके विपरीत, वाट्सएप पर लिखे गए एक छोटे से संदेश का अर्थ कई बार अलग-अलग निकाला जा सकता है। हम मजाक में कुछ लिखते हैं और सामने वाला उसे गंभीरता से ले लेता है। हम कुछ कहना चाहते हैं, लेकिन सही शब्द नहीं मिलते। खासकर बड़ी उम्र में यह समस्या और बढ़ सकती है। सामने बैठकर हम शायद अपनी बात अधूरे शब्दों में भी कह दें और सामने वाला हमारे भाव समझ ले, लेकिन लिखे हुए संदेश में वही बात गलत अर्थ दे सकती है।
इसलिए वर्चुअल दुनिया से दूरी बनाने की जरूरत नहीं है, लेकिन उसकी सीमा समझना बहुत जरूरी है।
युवा हों या वरिष्ठ नागरिक, हमें यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों से जुड़ना अच्छी बात है, लेकिन जीवन में कुछ ऐसे लोग भी होने चाहिए जिनके साथ हम बैठ सकें, हंस सकें, अपनी परेशानी साझा कर सकें और जरूरत पड़ने पर एक-दूसरे के साथ खड़े हो सकें।
आखिरकार, मोबाइल की स्क्रीन पर दिखाई देने वाले चेहरे और सामने बैठा अपना इंसान एक जैसे नहीं होते।
वर्चुअल दोस्ती अपनी जगह अच्छी है, लेकिन असली दोस्ती का कोई विकल्प नहीं। इसलिए वाट्सएप चलाइए, फेसबुक देखिए, इंस्टाग्राम पर जाइए, लेकिन कभी-कभी मोबाइल एक तरफ रखकर किसी पुराने दोस्त को फोन भी कीजिए। और उससे भी बेहतर हो तो उससे मिलने जाइए।
क्योंकि जिंदगी केवल ऑनलाइन नहीं है।
कुछ रिश्ते “ऑनलाइन” जुड़े रहते हैं, लेकिन जिंदगी असल में “ऑफलाइन” ही जी जाती है।
लेखक

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।




