शतायु जीवन: एक सजीव उदाहरण

शतायु जीवन: एक सजीव उदाहरण The Art of Living 100+ Years

पिछले लगभग दो वर्षों में मैंने 100 से अधिक लेख लिखे हैं, जो वरिष्ठ जनों के जीवन, अनुभव और संभावनाओं पर केंद्रित रहे हैं। मेरे नेवर से रिटायर्ड मिशन का उद्देश्य ही है—वरिष्ठ नागरिकों को सक्रिय, संलग्न और समाज के लिए मूल्यवान बनाए रखना।

अब तक मैंने कई लेखों में यह विचार साझा किया कि यदि हम अपने जीवन को संतुलित और अनुशासित ढंग से जिएं, तो 100 वर्ष की आयु प्राप्त करना असंभव नहीं है। हमारे धार्मिक ग्रंथ भी ‘शतायु भव’ का आशीर्वाद देते हैं—अर्थात लंबा, स्वस्थ और सार्थक जीवन जीने की प्रेरणा।

पिछले दिनों मुझे एक ऐसा सौभाग्य प्राप्त हुआ, जिसने मेरे इन विचारों को सजीव रूप दे दिया। मुझे 102 वर्षीया श्रीमती रत्ना महाजन जी से मिलने का अवसर मिला। उनसे मिलकर मन में एक अलग ही प्रसन्नता और संतोष का भाव उत्पन्न हुआ—जैसे सिद्धांत आज साक्षात सामने खड़ा हो।

मैं उनके घर के ड्रॉइंग रूम में बैठा ही था कि उनकी 73 वर्षीय पुत्री कुसुम जी से बातचीत शुरू हुई। तभी माताजी वॉकर के सहारे धीरे-धीरे हमारी ओर आती हुई दिखाई दीं। उनके चेहरे पर अद्भुत तेज और आत्मविश्वास था। मैंने उनके चरण स्पर्श किए, तो उन्होंने स्नेहपूर्ण मुस्कान के साथ आशीर्वाद दिया। ज्ञात हुआ कि उन्होंने वॉकर का सहारा मात्र दो वर्ष पूर्व लिया, उससे पहले कई वर्षों तक वे छड़ी के सहारे चलती रहीं।

मेरी जिज्ञासा उनसे प्रश्न पूछने की थी, और आश्चर्यजनक रूप से उतनी ही उत्सुकता उनके मन में भी थी बातचीत करने की। उनकी स्मरण शक्ति और स्पष्टता देखकर मैं अभिभूत रह गया। वे पुराने समय की घटनाओं को पूरे आत्मविश्वास के साथ याद कर रही थीं।

विभाजन के समय वे लाहौर से भारत आई थीं। उस समय वे गर्भवती थीं। उस कठिन दौर का वर्णन करते-करते उनकी आंखों में एक हल्की उदासी उतर आई। उनके पति का निधन वर्ष 2005 में हुआ।

स्वास्थ्य के विषय में पूछने पर उन्होंने जो बताया, वही शायद उनके दीर्घायु जीवन का रहस्य है। उन्होंने बताया कि उनके समय में वे नियमित रूप से मलाई सहित दो बड़े गिलास दूध पीती थीं, और कई बार तो सीधे गाय के थन से ताजा दूध भी लेती थीं। देशी घी और मक्खन का भरपूर सेवन भी उनके जीवन का हिस्सा रहा है। आज भी वे पूजा के पश्चात बदाम, अखरोट, मखाना और छिलके सहित भुना चना लेती हैं। चबाने में कठिनाई होने के कारण कई चीजों को पाउडर बनाकर लेती हैं।

एक महत्वपूर्ण बात उन्होंने विशेष रूप से कही—वे कभी भी अधिक भोजन (ओवरईटिंग) नहीं करतीं। उन्हें पोहा, चिल्ला और इडली-वड़ा विशेष रूप से पसंद हैं, जबकि पराठे भी कभी-कभी ले लेती हैं।

सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि वर्तमान में वे कोई नियमित दवा नहीं लेतीं। पहले डायबिटीज और उच्च रक्तचाप की दवाइयां लेती थीं, लेकिन अब सब कुछ सामान्य होने के कारण दवा की आवश्यकता नहीं है।

उनकी पुत्री बताती हैं कि स्नान और वस्त्र पहनने में सहायता के अतिरिक्त उन्हें किसी विशेष सहयोग की आवश्यकता नहीं होती।

उनका दैनिक जीवन भी उतना ही अनुशासित है—सुबह-शाम गीता पाठ, हनुमान चालीसा, गणेश वंदना और गंगा आरती। कभी-कभी वे मंदिर भी जाती हैं और पुराने परिचितों से मिलकर उनका कुशलक्षेम पूछती हैं। आश्चर्य यह कि उन्हें आज भी सभी के नाम याद हैं।

वे टीवी पर समाचार देखती हैं और समसामयिक घटनाओं में गहरी रुचि रखती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वे प्रशंसक हैं। उनकी पुत्री ने बताया कि पिछले चुनाव में उन्होंने एक जिंगल भी बनाया—

मोदी को जो जिताएगा, वो मीठे फल खाएगा।

जब उनसे आज के युवाओं के लिए संदेश पूछा गया, तो उन्होंने अत्यंत सरल शब्दों में कहा—

झूठ न बोलें, माता-पिता की सेवा करें, उनका सम्मान करें और काम, क्रोध, मोह, लोभ व अहंकार से दूर रहें।

वास्तव में, माताजी के जीवन के ये सूत्र केवल वरिष्ठों के लिए ही नहीं, बल्कि युवाओं के लिए भी उतने ही प्रासंगिक हैं। यदि हम शतायु जीवन की कामना करते हैं, तो हमें उनके जैसे अनुशासित जीवन, संतुलित आहार और सकारात्मक सोच को अपनाना होगा।

उनके साथ लिया गया यह साक्षात्कार और उनका भजन शीघ्र ही नेवर से रिटायर्ड के यूट्यूब चैनल पर उपलब्ध होगा।

लेखक

विजय मारू
विजय मारू

लेखक नेवर से रिटायर्ड मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप नेवर से रिटायर्ड फोरम के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

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