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title: वृद्धाश्रम कितने आवश्यक हैं?
author:
  name: विजय मारू
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date: '2026-01-17T00:40:30+05:30'
modified: '2026-01-15T00:45:17+05:30'
type: post
categories:
  - Age Power
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# वृद्धाश्रम कितने आवश्यक हैं?

समाज की बदलती परिस्थितियों को देखते हुए अब यह स्वीकार करना ही होगा कि भारत में भी वृद्धाश्रमों की आवश्यकता निरंतर बढ़ती जा रही है। वह समय अब केवल स्मृतियों में सिमट गया है जब संयुक्त परिवारों में बुजुर्ग, युवा और बच्चे एक साथ रहते थे। तब वृद्धाश्रम की कल्पना भी सामाजिक अपराध या पाप के समान मानी जाती थी। लेकिन समय बदला है, जीवनशैली बदली है और साथ ही पारिवारिक संरचना भी।

हमने अपने बच्चों को सर्वोत्तम शिक्षा दी, उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। उन्होंने प्रगति की, सफल हुए और अपने करियर के लिए हमसे दूर चले गए। गर्व से हम दूसरों को बताते रहे—“मेरा बेटा अमेरिका में है, लाखों रुपये महीना कमाता है।” ऐसे उदाहरण केवल गिने-चुने नहीं हैं; सैकड़ों परिवारों की यही कहानी है। केवल विदेश ही नहीं, देश के बड़े शहरों में भी हमारे बच्चे बेहतर अवसरों की तलाश में बस गए हैं।

इन परिस्थितियों में न तो बच्चे अपने मूल शहर या गांव लौटना चाहते हैं और न ही कई माता-पिता उनके साथ जाना पसंद करते हैं। अपनी जड़ों से जुड़ाव, सामाजिक परिवेश, भाषा और जीवनशैली—इन सबके कारण बुजुर्ग अक्सर अपने ही स्थान पर रहना बेहतर समझते हैं। इसके अतिरिक्त स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं, निजी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान भी ऐसे निर्णयों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पिछले सप्ताह मुझे रांची स्थित एक वृद्धाश्रम जाने का अवसर मिला। वहां की व्यवस्था देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। अपेक्षाकृत कम खर्च में स्वच्छ, सुरक्षित और गरिमापूर्ण जीवन की व्यवस्था थी। लगभग पचास बुजुर्ग वहां निवास कर रहे थे। यह वृद्धाश्रम आर्य ज्ञान प्रचार समिति द्वारा संचालित है और वर्ष 2000 से लगातार सेवा में संलग्न है।

लौटते समय मुझे उनकी पत्रिका ‘जीवन संध्या’ दी गई। उसमें वहां रहने वाले बुजुर्गों के अनुभव पढ़ने को मिले। इन अनुभवों से यह समझने का अवसर मिला कि किन परिस्थितियों में लोग वृद्धाश्रम तक पहुंचते हैं—और यह भी कि इनमें से अधिकांश कारण नकारात्मक नहीं, बल्कि जीवन की वास्तविकताओं से जुड़े होते हैं।

एक दंपत्ति ने लिखा कि बच्चों के बिना उन्हें गहरा अकेलापन महसूस होने लगा था। घर के दैनिक काम संभालना कठिन हो गया था और मानसिक शांति भी समाप्त हो चुकी थी। वृद्धाश्रम में आकर उन्हें न केवल सहारा मिला, बल्कि समान आयु वर्ग के लोगों के साथ रहने से जीवन में फिर से उत्साह लौटा।

एक अन्य महिला ने लिखा कि उनकी दो बेटियों की शादी हो चुकी थी। पति के निधन के बाद घर पूरी तरह सूना लगने लगा। वृद्धाश्रम में आकर उन्हें फिर से अपनापन और उद्देश्य मिला।

एक कहानी अत्यंत मार्मिक भी थी। वह लिखती हैं कि उनके चार पुत्र और एक पुत्री हैं। चालीस वर्षों की सेवा के बाद सेवानिवृत्त होने पर भी कोई संतान उन्हें अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुई। तब उन्हें एहसास हुआ कि बच्चों का लगाव उनसे नहीं, उनकी आर्थिक स्थिति से था। उम्र और बीमारी के कारण शारीरिक रूप से वे असमर्थ हो चुकी थीं और मानसिक रूप से भी टूट चुकी थीं। ऐसे अंधकारमय समय में यह वृद्धाश्रम उनके लिए प्रकाश की किरण बनकर सामने आया।

इस वृद्धाश्रम की स्थापना में प्रमुख भूमिका निभाने वाले समाजसेवी श्री एस. एल. गुप्ता कहते हैं—  
“मेरा मानना है कि आदर्श समाज में वृद्धाश्रम होने ही नहीं चाहिए, क्योंकि यह भारतीय संस्कारों के विरुद्ध है। लेकिन आज की परिस्थितियों में कई बार यही वृद्धाश्रम बुजुर्गों के लिए संजीवनी बूटी सिद्ध होते हैं। वरना वे जाएं तो कहां जाएं?”

आज की सामाजिक सच्चाइयों को देखते हुए कई लोग मानते हैं कि आने वाले वर्षों में भारत जैसे देश में बड़ी संख्या में वृद्धाश्रमों की आवश्यकता पड़ेगी। यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो हम बुजुर्गों के प्रति अपने सामाजिक दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पाएंगे।

आज वृद्धाश्रम विभिन्न श्रेणियों में उपलब्ध हैं—उच्च सुविधाओं वाले आधुनिक आश्रमों से लेकर सामान्य सेवा-भाव से संचालित संस्थाओं तक। लेकिन इस क्षेत्र में सुव्यवस्थित और गुणवत्तापूर्ण विकास के लिए सरकार की सक्रिय भूमिका अनिवार्य है। इच्छुक संस्थाओं को कर-छूट, सस्ती भूमि, जीएसटी में रियायत और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं।

इसके साथ ही वृद्धाश्रमों के पंजीकरण और न्यूनतम मानकों की स्पष्ट व्यवस्था भी आवश्यक है। वर्तमान में देश में कुल कितने वृद्धाश्रम संचालित हो रहे हैं, इसका कोई प्रमाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। विभिन्न स्रोतों के अनुसार यह संख्या लगभग 700 से 1300 के बीच बताई जाती है। ऐसे में सरकार के पास एक ठोस डाटा होना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गुणवत्ता और निगरानी सुनिश्चित की जा सके।

अब यह स्पष्ट है कि वृद्धाश्रम केवल भावनात्मक विषय नहीं, बल्कि एक सामाजिक आवश्यकता बन चुके हैं। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में वरिष्ठ नागरिकों की संख्या लगभग 32 करोड़ हो जाएगी। इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए हमें यह समझना होगा कि वृद्धाश्रम त्याग का प्रतीक नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का एक विकल्प हैं।

#### लेखक

![विजय मारू](https://neversayretired.in/wp-content/uploads/2025/01/maroo-vijay-mission-never-say-retired-150x150.jpg)***विजय मारू***

लेखक **नेवर से रिटायर्ड** मिशन के प्रणेता है। इस ध्येय के बाबत वो इस वेबसाइट का भी संचालन करते है और उनके फेसबुक ग्रुप **नेवर से रिटायर्ड फोरम** के आज कई हज़ार सदस्य बन चुके है।

